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मंगलवार, फ़रवरी 09, 2016
सोमवार, जनवरी 04, 2016
"सम्वेदना की नम धरा पर" (समीक्षक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
साधना वैद की साधना
“सम्वेदना की नम धरा पर”
जिसको मन मिला है एक कवयित्री का, वो सम्वेदना की
प्रतिमूर्ति तो एक कुशल गृहणी ही हो सकती है। ऐसी प्रतिभाशालिनी कवयित्री का नाम
है साधना वैद। जिनकी साहित्य निष्ठा देखकर मुझे प्रकृति के सुकुमार चितेरे श्री
सुमित्रानन्दन पन्त जी की यह पंक्तियाँ याद आ जाती हैं-
"वियोगी होगा पहला कवि, हृदय से उपजा होगा गान।
निकल कर नयनों से चुपचाप, बही होगी कविता
अनजान।।"
आमतौर पर देखने
में आया है कि जो महिलाएँ ब्लॉगिंग कर रही हैं उनमें से ज्यादातर चौके-चूल्हे और
रसोई की बातों को ही अपने ब्लॉगपर लगाती हैं। किन्तु साधना वैद ने इस मिथक को
झुठलाते हुए, सदैव साहित्यिक सृजन ही अपने ब्लॉग “सुधिनामा” में किया है।
चार-पाँच दिन पूर्व मुझे डाक द्वारा “संवेदना की
नम धरा पर” काव्य संकलन प्राप्त हुआ। पुस्तक के नाम और आवरण ने मुझे प्रभावित किया
और मैं इसको पढ़ने के लिए स्वयं को रोक न सका। जबकि इससे पूर्व में प्राप्त हुई कई
मित्रों की कृतियाँ मेरे पास समीक्षा के लिए कतार में हैं।
सादना वैद ने
अपने काव्य संग्रह “संवेदना की नम धरा पर” में यह सिद्ध कर दिया है कि वह न केवल
एक कवयित्री है बल्कि शब्दों की कुशल
चितेरी भी हैं-
"चल मन ले चल मुझे झील के उसी किनारे।
जहाँ दिखा था पानी में प्रतिबिम्ब तुम्हारा,
उस इक पल से जीवन का सब दुख था हारा,
कितनी मीठी यादों के थे मन में तारे।
चल मन ले चल मुझे झील के उसी किनारे।"
कवयित्री ने अपने काव्यसंग्रह
की मंजुलमाला में एक सौ इक्यावन रचनाओं के मोतियों को पिरोया है जिनमें माँ, आशा, उलझन,
मौन, मेरी बिटिया, अन्तर्व्यथा, संकल्प, चुनौती, आहट, गुत्थी, चूक, अंगारे, कश्ती,
संशय, हौसला, सपने, लकीरें, हाशिए, विश्वास आदि अमूर्त मानवीय संवेदनाओं पर तो अपनी संवेदना बिखेरी है साथ ही दूसरी ओर प्राकृतिक उपादानों को भी अपनी रचना का विषय बनाया है।
इसके अतिरिक्त प्रेम के विभिन्न रूपों को भी उनकी रचनाओं में विस्तार मिला है।
“वह तुम्हीं हो सकती थी माँ
जो बाबू जी की लाई
हर नई साड़ी का उद्घाटन
मुझसे कराने के लिए
महीनों मेरे मायके आने का
इन्तजार किया करती थी
कभी किसी नयी साड़ी को
पहले खुद नहीं पहना
वह तुम्हीं हो सकती थी माँ”
“संवेदना की नम धरा पर” काव्यसंग्रह में क्या होग कवयित्री
ने अपनी अपनी व्यथा को कुछ इस प्रकार अपने शब्द दिये हैं-
“रसोई से बैठक तक
घर से स्कूल तक
रामायण से अखबार तक
मैंने कितनी आलोचनाओं का जहर पिया है
तुम क्या जानो!”
जहाँ तक मुझे ज्ञात है कवयित्री ने बहुत सारी छन्दबद्ध
रचनाएँ की हैं परन्तु “संवेदना
की नम धरा पर” काव्यसंकलन में साधना वैद ने छंदो को अपनी रचनाओं में अधिक महत्व न देकर भावों को ही प्रमुखता दी है और
सोद्देश्य लेखन के भाव को अपनी रचनाओं में हमेशा जिन्दा रखा है।
“कितना कसकर बाँधा था
उसने अपने मन की
इस गिरह को
कितना विश्वास था उसे कि
यह सात जन्मों तक भी
नहीं खुलेंगी!
लेकिन वक्त के फौलादी हाथ
कितने ताकतवर हैं
यह अनुमान वह
कहाँ लगा पाई!”
समाज में
व्याप्त हो रहे आडम्बरों और पूजा पद्धति पर भी करीने के साथ चोट करने में कवयित्री
ने अपनी सशक्त लेखनी को चलाया है-
“कहाँ-कहाँ ढूँढू तुझे
कितने जतन करूँ
किस रूप को ध्यान में धरूँ
किस नाम से पुकारूँ
मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारा
किस दरकी कुण्डी खटखटाऊँ
किस पंडित किस मौलवी
किस गुरू के चरणों में
शीश झुकाऊँ
बता मेरे मौला
मैं कहाँ तुझे पाऊँ?”
जन्मदात्री माता
के प्रति कवयित्री ने अपनी वचनबद्धता व्यक्त करते हुए लिखा है-
“तुम मुझे संसार में
आने तो दो माँ
देख लेना
मैं सारे संसार के उजाले
तुम्हारी आँखों में भर दूँगी!”
छन्दबद्ध कृति
के काव्यसौष्ठव का अपना अनूठा ही स्थान होता है जिसका निर्वहन कवयित्री ने कुशलता
के साथ किया है-
“दे डाली थीं जीने को जब इतनी साँसें
जीने का भी कोई तो मकसद दे देते,
इन साँसों की पीर तुम्हें जो पहुँचा पाये
कोई तो ऐसा हमदम कासिद दे देते!”
“संवेदना की नम धरा पर” काव्यसंकलन को पढ़कर मैंने अनुभव किया है कि कवयित्री
साधना वैद ने भाषिक सौन्दर्य के अतिरिक्त कविता और शृंगार की सभी विशेषताओं का संग-साथ
लेकर जो निर्वहन किया है वह अत्यन्त सराहनीय है।
मुझे पूरा विश्वास है कि पाठक “संवेदना की नम धरा पर” काव्यसंकलन को पढ़कर अवश्य लाभान्वित होंगे और यह कृति समीक्षकों
की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगी।
“संवेदना की नम धरा पर” काव्यसंकलन को आप कवयित्री के पते
33/23, आदर्श नगर, रकाबगंज, आगरा (उ.प्र.) से प्राप्त
कर सकते हैं। इनका सम्पर्क नम्बर - 09319912798 तथा
E-Mail . sadhana.vaid@gmail.com है।
278 पृष्ठों की सजिल्द पुस्तक का मूल्य मात्र
रु. 225/- है।
दिनांकः 04-01-2016
(डॉ.
रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
कवि एवं साहित्यकार
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर
(उत्तराखण्ड) 262 308
E-Mail . roopchandrashastri@gmail.com
Website. http://uchcharan.blogspot.com.
Mobile No. 9997996437
शुक्रवार, सितंबर 18, 2015
"डोर तुम्हारे हाथों में-देवदत्त 'प्रसून' " (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों।
कवि देवदत्त "प्रसून" आज हमारे बीच नहीं हैं।
लेकिन उनका साहित्य अमर रहेगा।
--
गत वर्ष 25 नवम्बर, 2014 को मेेरे अभिन्न मित्र
देवदत्त प्रसून का अचानक देहान्त हो गया था।
--
कल 19 सितम्बर, 2015 को सायं 4 बजे से मेरे एम.ए. के साथी
और अभिन्न मित्र स्व. देवदत्त प्रसून की पुस्तक "झरी नीम की पत्तियाँ"
का विमोचन पीलीभीत में टनकपुररोड पर स्थित पीलीभीत वेकटहाल में किया जायेगा।
गत वर्ष आदरणीय प्रसून जी का नवम्बर में देहान्त हो गया था।
उनकी पत्नी श्रीमती मीना गंगवार ने
उनकी पुस्तक को प्रकाशित कराया है।
सभी साहित्य प्रेमियों से निवेदन है कि
वह इस कार्यक्रम में भाग लेने का प्रयत्न करें।
--
उनकी स्मृति में उनकी यह अन्तिम रचना (गीत) प्रस्तुत कर रहा हूँडोर तुम्हारे हाथों में (देवदत्त प्रसून) |
लेबिल:
गीत,
डोर तुम्हारे हाथों में,
देवदत्त 'प्रसून'
शुक्रवार, जुलाई 24, 2015
"दूध में पानी मिलाने का अद्भुत् तरीका" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
खटीमा (उत्तराखण्ड)
दूध में पानी मिलाने का अद्भुत् तरीका।
सहकारी दुग्ध संघ चम्पावत के कर्मचारियों द्वारा
सरे आम बर्फ की 10 सिल्लियों को
दूद के टैंकर में डाला जा रहा है।
इसके दो फायदे हैं -
पहला तो यह कि दूध खराब नहीं होगा।
और दूसरा यह कि 7-8 कुन्टल पानी दूध में मिलाकर
उसको दूध के दाम पर बेचा जायेगा।
लाभ किन किन को मिलेगा ?.........
देखिए मेरे द्वारा लिए गये चित्र
यह है वह गैर जिम्मेदार व्यक्ति
जो छल-फरेब-मिलावट में लिप्त है।
बुधवार, जून 17, 2015
"अमर वीरंगना लक्ष्मीबाई की 157वीं पुण्यतिथि पर" (श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान)
अमर वीरांगना झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई की

157वीं पुण्यतिथि पर
उन्हें अपने श्रद्धासुमन समर्पित करते हुए
श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की
यह अमर कविता सम्पूर्णरूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ!

सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटि तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन् सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कानपुर के नाना की मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के संग पढ़ती थी वह नाना के संग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाली की गाथाएँ उसको याद जबानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता का अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार,
महाराष्ट्र कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छाई,
किन्तु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई,
निःसंतान मरे राजा जी रानी शोक-समानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौजी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
अनुनय-विनय नहीं सुनता है, विकट फिरंगी की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं-नब्वाबों के उसने पैरों को ठुकराया,
रानी दासी बनी यह दासी अब महारानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
छिनी राजधानी देहली की, लिया लखनऊ बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्रनिपात,
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी रोई रनिवासों में, बेगम गम से थी बेजार,
उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार,
सरेआम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
नागपूर के जेवर ले लो, लखनऊ के लो नौलख हार,
यों परदे की इज्जत पर देशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
कुटिया में थी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधुंपंत-पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रणचंडी का कर दिया प्रकट आह्वान,
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिंगारी अंतरमन से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनउ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
नाना, धुंधुंपंत, ताँतिया, चतुर अजीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह, मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी वो कुर्बानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
इनकी गाथा छोड़ चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में,
जख्मी होकर वाकर भागा उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थककर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
विजय मिली, पर अंग्रेजों की फिर सेना घिर आई थी,
अब के जनरल स्मिथ सन्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आईं थीं,
युद्ध-क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी,
पर, पीछे ह्यूरोज आ गया हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
तो भी रानी मार-काटकर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रानी गई सिधार, चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र थी कुल तेईस की, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा स्मारक तू होगी तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
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कृपया नापतोल.कॉम से कोई सामन न खरीदें।
मैंने Napptol.com को Order number- 5642977
order date- 23-12-1012 को xelectron resistive SIM calling tablet WS777 का आर्डर किया था। जिसकी डिलीवरी मुझे Delivery date- 11-01-2013 को प्राप्त हुई। इस टैब-पी.सी में मुझे निम्न कमियाँ मिली-
1- Camera is not working.
2- U-Tube is not working.
3- Skype is not working.
4- Google Map is not working.
5- Navigation is not working.
6- in this product found only one camera. Back side camera is not in this product. but product advertisement says this product has 2 cameras.
7- Wi-Fi singals quality is very poor.
8- The battery charger of this product (xelectron resistive SIM calling tablet WS777) has stopped work dated 12-01-2013 3p.m. 9- So this product is useless to me.
10- Napptol.com cheating me.
विनीत जी!!
आपने मेरी शिकायत पर करोई ध्यान नहीं दिया!
नापतोल के विश्वास पर मैंने यह टैबलेट पी.सी. आपके चैनल से खरीदा था!
मैंने इस पर एक आलेख अपने ब्लॉग "धरा के रंग" पर लगाया था!
"नापतोलडॉटकॉम से कोई सामान न खरीदें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
>> 17 January, 2013 – चेतावनी, नापतोल.कॉम चैनल से कोई सामान न खरीदें
जिस पर मुझे कई कमेंट मिले हैं, जिनमें से एक यह भी है-
Sriprakash Dimri – (January 22, 2013 at 5:39 PM)
शास्त्री जी हमने भी धर्मपत्नी जी के चेतावनी देने के बाद भी
शास्त्री जी हमने भी धर्मपत्नी जी के चेतावनी देने के बाद भी
नापतोल डाट काम से कार के लिए वैक्यूम क्लीनर ऑनलाइन शापिंग से खरीदा ...
जो की कभी भी नहीं चला ....ईमेल से इनके फोरम में शिकायत करना के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला ..
.हंसी का पात्र बना ..अर्थ हानि के बाद भी आधुनिक नहीं आलसी कहलाया .....
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मान्यवर,
मैंने आपको चेतावनी दी थी कि यदि आप 15 दिनों के भीतर मेरा प्रोड्कट नहीं बदलेंगे तो मैं
अपने सभी 21 ब्लॉग्स पर आपका पर्दाफास करूँगा।
यह अवधि 26 जनवरी 2013 को समाप्त हो रही है।
अतः 27 जनवरी को मैं अपने सभी ब्लॉगों और अपनी फेसबुक, ट्वीटर, यू-ट्यूब, ऑरकुट पर
आपके घटिया समान बेचने
और भारत की भोली-भाली जनता को ठगने का विज्ञापन प्रकाशित करूँगा।
जिसके जिम्मेदार आप स्वयं होंगे।
इत्तला जानें।







