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शनिवार, मई 30, 2015

‘‘जय शंकर प्रसाद’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

हिन्दी के उन्नायक
जयशंकर प्रसाद
"हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्जवला स्वतंत्रता पुकारती
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लो
प्रशस्त पुण्य पंथ हैं - बढ़े चलो बढ़े चलो
असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के रुको न शूर साहसी
अराति सैन्य सिंधु में, सुबाड़वाग्नि से जलो
प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो बढ़े चलो"
  यशस्वी साहित्यकार ‘‘जय शंकर प्रसाद’’ को नमन करते हुए छायावाद के उन्नायक कवि को अपने श्रद्धा सुमन समर्पित करता हूँ।   जय शंकर प्रसाद जी का जन्म वाराणसी के वैश्य परिवार में सन् 1890 में हुआ था। इनके बाबा का नाम बाबू शिवरत्न गुप्त तथा पिता का नाम देवीप्रसाद गुप्त था। जो सुंघनी साहु के रूप में काशी भर में विख्यात थे। दानवीरता और कलानुरागी के रूप में यह परिवार जाना जाता था। प्रसाद जी को भी ये गुण विरासत में मिले थे। 
   बचपन में ही इनके माता-पिता का देहान्त हो गया था। इससे इनका परिवार विपन्नता की स्थिति में पहुँच गया था। दुःख और विषाद के बीच झूलते हुए इनकी पढ़ाई भी सातवीं कक्षा से ही छूट गयी थी। लेकिन धुन के धुनी जयशंकर प्रसाद ने अध्यवसाय नही छोड़ा। देखते ही देखते वे अपनी लगनशीलता के कारण संस्कृत, हिन्दी, उर्दु, फारसी, अंग्रेजी तथा बंगला भाषा में पारंगत हो गये।
   अत्यधिक परिश्रम के कारण उन्होंने फिर से अपनी आर्थिक शाख भी प्राप्त कर ली थी। जिसके परिणामस्वरूप उन्हें क्षय ने अपनी गिरफ्त में जकड़ लिया और मात्र 47 वर्ष की आयु में ही उनका देहान्त हो गया।
साहित्यिक योगदान-
    जयशंकर प्रसाद बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे केवल छायावाद के ही प्रमुख स्तम्भ नही थे अपितु उन्होंने नाटक, कहानी, उपन्यास आदि के क्षेत्र में अपनी लेखनी का लोहा मनवा लिया था।
कविरूप-
    प्रसाद जी खड़ी बोली के प्रमुख कवि थे। लेकिन शुरूआती दौर में उन्होंने ब्रजभाषा में भी अपनी कवितायें लिखीं थी। जो बाद में चित्राधार में संकलित हुईं। उनकी काव्य कृतियों की संख्या नौ है।
1- चित्राधार (1908)2- करुणालय (1913)3- प्रेम पथिक (1914)4- महाराणा का महत्व (1914)5- कानन कुसुम (1918)6- झरना (1927)7- आँसू (1935)8- लहर (1935) और 9- कामायनी (1936)
उपन्यासकार-
    प्रसाद जी ने अपने जीवनकाल में तीन उपन्यास हिन्दी साहित्य को दिये। 1-कंकाल और 2-तितली उनके सामाजिक उपन्यास हैं। इनका तीसरा उपन्यास इरावतीहै। लेकिन यह अपूर्ण है। यदि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखा यह उपन्यास पूर्ण हो जाता तो प्रसाद जी उपन्यास के क्षेत्र में भी अपना लोहा मनवा लेते।
कहानीकार-
     प्रसाद जी ने लगभग 35 कहानियाँ लिखी है। जो छाया, प्रतिध्वनि, आकाशदीप , आँधी और इन्द्रजाल के नाम से पाँच संग्रहों में संकलित हैं।
    उन्होंने अपनी पहली कहानी स्वयं ही इन्दु नामक पत्रिका में सन् 1911 में ग्रामशीर्षक से छापी थी। उनकी अन्तिम कहानी है सालवती।
    प्रसाद जी की अधिकांश कहानियाँ ऐतिहासिक या काल्पनिक रही हैं, किन्तु सभी में प्रेम भाव की सलिला प्रवाहित होती रही है।
निबन्धकार-
    प्रसाद जी के निबन्धकार का दिग्दर्शन हमें उनकी विभिन्न कृतियों की भूमिकाओं में दृष्टिगोचर होता है। काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध उनकी प्रख्यात निबन्ध रचना है। उनके चिंतन, मनन और गम्भीर अध्ययन की छवि उनके निबन्धों में परिलक्षित होती है।
नाटककार-
   जयशंकर प्रसाद जी एक महान कवि होने के साथ-साथ एक सफल नाटककार भी थे। उनके कुल नाटकों की संख्या तेरह है।
1- सज्जन (1910)। 
2- कल्याणी परिणय (1912)। 
3- करुणालय (1913)। 
4- प्रायश्चित (1914)। 
5- राज्यश्री (1915)। 
6- विशाख (1921)। 
7- जनमेजय का नागयज्ञ (1923)। 
8- अजात शत्रु (1924)। 
9- कामना (1926)। 
10- एक घूँट (1929-30)। 
11- स्कन्द गुप्त (1931)। 
12- चन्द्रगुप्त (1932)। और 
13- ध्रुव स्वामिनी (1933)
   प्रसाद जी ने अपने नाटकों में तत्सम शब्दावलि प्रधान भाषा, काव्यात्मकता, गीतों का आधिक्य, लम्बे सम्वाद, पात्रों का बाहुल्य तथा देश-प्रेम को प्रमुखता दी है।
   अन्त में इतना ही लिखना पर्याप्त होगा कि जयशंकर प्रसाद जी का व्यक्तित्व और कृतित्व साहित्य-जगत में अपनी अलग और अद्भुद् पहचान लिए हुए है।
छायावाद के इस महान उन्नायक ने हिन्दी साहित्य को उपन्यास, कहानियों, नाटकों और निबन्धों धन्य कर दिया। कामायिनी जैसा महाकाव्य रच कर एक प्रख्यात कवि के रूप में अपना विशेष स्थान बनानेवाले प्रसाद जी को मैं अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि समर्पित करता हूँ। स्वदेशानुरागी इस महान साहित्यकार को भला कौन हिन्दी प्रेमी भूल सकता है।

रविवार, मार्च 29, 2015

पुस्तक विमोचन - "इतिहास थारू-बुक्सा जनजातियों का" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

खटीमा (उत्तराखण्ड) 29 मार्च, 2015
      आज दिनांक 29 मार्च, 2015 सोमवार को स्थानीय लेखक बलबीर कुमार अग्रवाल की दो पुस्तकों "इतिहास थारू-बुक्सा जनजातियों का अन्वेषण ग्रन्थ भाग-1" और "इतिहास थारू-बुक्सा जनजातियों का अन्वेषण ग्रन्थ भाग-2" का विमोचन उत्तराखण्ड सरकार के राजस्व मन्त्री माननीय यशपाल आर्य के कर कमलों दावारा किया गया। इस अवसर पर स्थीय विधायक मा. पुष्कर सिंह धामी, मा. गोपाल सिंह राणा, ब्लॉक प्रमुख, खटीमा मा. दानसिंह राणा, रमेश सिंह राणा, मा. महेश जोशी, दैनिक जागरण के पटना सेल्स प्रभारी डॉ. राम आज्ञा तिवारी, दैनिक जागरण के तथा रुहेलखण्ड और कुमाऊँ के महाप्रबन्धक ए.एन.सिंह , दैनिक जागरण हल्द्वानी के यूनिट हैड अळोक त्रिपाठी, किसान नेता प्रकाश तिवारी, गुरूद्वारा नानक मत्ता के मैनेजर, पूर्व पालिका अध्यक्ष वहीदुल्लाह खाँ, सितारगंज के पालिकाध्यक्ष कान्ता प्रसाद सागर, शिवक्मार मित्तल, व्यापार मण्डल के जिला अध्यक्ष अरुण सक्सेना, कांग्रेस के नगर अध्यक्ष राजू जुनेजा, सीनियर सिटीजन सोसायटी के अध्यक्ष वीरेन्द्र कुमार टण्डन, स्थानीय साहित्यकारों में डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक, गेंदा लाल शर्मा, गुरुसहाय भटनागर, राजकिशोर सक्सेना  तथा स्थानीय और क्षेत्रीय नागरिकों के अपार जनसमूह के बीच सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता सितार गंज के विधायक डॉ.प्रेम सिंह राणा ने की और संचालन द्याकिशन कलोनी के साथ अमन अग्रवाल मारवाड़ी ने की।
      विदित हो कि उत्तराखण्ड का खटीमा-सितारगंज क्षेत्र एक जनजाति बाहुल्य क्षेत्र है। जिसमें यहाँ के  आदिवासी थारू समुदाय के लोग रहते हैं।
इस विमोचन के कुछ चित्र मेरे कैमरे की नजर से-




गुरुवार, जनवरी 01, 2015

‘‘लघुकथा-मनमाना काम, मनमाना दाम’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

बरसात से पूर्व घर में कुछ छुट-पुट मरम्मत का कार्य करवाना था। एक अदद राज मिस्त्री और दो मजदूरों की जरूरत थी। 

इन्हें लाने के लिए चौराहे पर गया। 500 रु0 प्रतिदिन मजदूरी के हिसाब से राज-मिस्त्री तो मिल गया।
अब मजदूर खोजने लगे। 2-4 लोगों से कहा कि मजदूरी पर चलोगे।
उन्होंने पूछा-‘‘क्या काम है।
हमने कहा- ‘‘छुट-पुट मरम्मत का काम है।’’
मजदूरों ने कहा- ‘नही जायेंगे साहब! लिण्टर के काम में जायेंगे, वहाँ 250 की मजदूरी मिलती है।’’
काफी खोज-बीन के बाद 250 रु0 प्रतिदिन के हिसाब से दो मजदूर मिल ही गये। 
................
जुलाई का प्रथम सप्ताह। विद्यालय में नये अध्यापकों के लिए इण्टरव्यू चल रहे थे। रिक्तियाँ लगभग पूरी हो गयी थी।
अगले दिन एक नौकरी की आशा में एक नवयुवक विद्यालय में आया।
योग्यता थी- एम0एससी०, लेकिन अध्यापकों के पद तो सारे भरे जा चुके थे।
विद्यालय के प्रबन्धक ने इस युवक को कह दिया-‘‘सीटें तो सारी भरी जा चुकी हैं, हमारे यहाँ कोई वैकेन्सी नही है।"
अब युवक गिड़गिड़ाते हुए बोला- ‘‘सर! 1500 रु0 महीने पर ही रख लीजिए।’’
हमने अपना माथा पीट लिया-
‘‘वाह! अँगूठा छाप को मनमाना काम 
और मनमाना दाम।’’
लेकिन पढ़े-लिखे लोग बेकार.......
दर-दर की ठोकरे खाने को लाचार।

मंगलवार, दिसंबर 09, 2014

"मेरा सैमसंग गैलैक्सी एस-4 मोबाइल चोरी हो गया"


आज मेरा सैमसंग गैलैक्सी एस-4 मोबाइल चोरी हो गया।
हुआ यों कि मैं 3बजे घर के नीचे बने अपने ऑफिस से ऊपर घर में चाय पीने आया था। मोबाइल टेबिल पर ही छूट गया था। ऐसा अक्सर कभी-कभी हो जाता था।
    लेकिन जब मैं 3-20 पर ऑफिस आया तो मोबाइल वहाँ नहीं था। कॉल करके देखा तो मोबाइल स्विचऑफ आ रहा था।
   अब तो यह चिन्ता का विषय था। 27000 रुपये की चपत लगीकोई बात नहीं। लेकिन सबसे बड़ी चिन्ता इस बात की थी कि चोर ने घर देख लिया था।
फिर घटना सूत्र मिलाये जाने लगे, मगर कुछ समझ में नहीं आया। तभी मेरी नजर टेबिल पर पड़ी पत्रिकाओं की स्पीड पोस्ट पर पड़ी। लेकिन मैंने तो स्पीड पोस्ट रिसीव की ही नहीं थी।  फिर किसने मेरे हस्ताक्षर करके यह पोस्ट-पार्सल लिया होगा?
    शाम को 5 बजे मैं पोस्टऑफिस गया और पोस्टमास्टर से पूछा कि किसने मेरे स्पीडपोस्ट पार्सल पर हस्ताक्षर किये होंगे।
--
   उस समय पोस्टऑफिस में सारे पोस्टमैन मौजूद थे मगर हमारे क्षेत्र का पोस्टमैन वहाँ नहीं था। पोस्टमास्टर ने उसे मोबाइल करके बुलाया तो पता लगा कि  उसने खुद ही मेरी डिलीवरी पर हस्ताक्षर किये थे।
--
   मैंने पुलिस रिपोर्ट करने की बात की तो वह बार-बार मेरे पाँव छूकर माफी माँगने लगा और कहने लगा कि उसने
मोबाइल नहीं चुराया है।
--
   मेरे जाने के बाद पोस्टमास्टर ने उसे विषय की गम्भीरता गम्भीरता समझाई होगी इसलिए वह अपने एक साथी पोस्टमैन को लेकर मेरे घर आया। लेकिन तब भी वह माफी ही माँगता रहा। और चोरी नहीं कुबूली। जब मैं नामजद पुलिस रिपोर्ट की बात पर अड़ गया तो वह इस बात पर तैयार हो गया कि वह उसी कंडीशन का मोबाइल मुझे कल दोपहर 12 बजे तक लाकर दे देगा।
देखते हैं कल क्या होता है?...

मंगलवार, नवंबर 18, 2014

"शकुन्तला-महाकाव्य” की समीक्षा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जयप्रकाश चतुर्वेदी का महाकाव्य
"शकुन्तला-महाकाव्य”
         लगभग एक वर्ष पूर्व जयप्रकाश चतुर्वेदी का महाकाव्यसंकलन मुझे प्राप्त हुआ। लेकिन व्यस्तता के कारण इस पुस्तक के बारे में कुछ लिख ही नहीं पाया। आज जब अपनी बुकसैल्फ इस पुस्तक पर नज़र पड़ी तो सोचा कि सारे काम छोड़कर सुबह-सुबह ही कुछ लिखने का मन बना लिया।               
     यद्यपि अच्छे शब्दों का मेरे पास सर्वथा अभाव रहा है लेकिन फिर भी भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम तो शब्द ही हैं।
       पेपरबैक की जिल्द से सुसज्जित 154 पृष्ठों के इस महाकाव्य को कवि ने स्वयं प्रकाशित किया गया है। जिसका मूल्य मात्र रु.100/- रखा गया है।
       महाकवि जयप्रकाश चतुर्वेदी ने अपने दो शब्दों में उल्लेख किया है-
        “काव्य मनुष्य के जीवन का पाप-ताप-सन्ताप हरण करने वाला मधुपर्क महौषधि है। जिसमें स्वभावतः जन-कल्याण भावना निहित होती है। यद्यपि इस महाकाव्य का विषय दुष्यन्त एवं शकुन्तला के पवित्र-परिणय प्रेम की कथा है परन्तु यह विषय महाभारत, पद्मपुराण, तथा श्रीमद्भागवत जैसे पवित्र ग्रन्थों का अंगभूत होने के कारणलोककल्याणकर भी है।.... इसीलिए मैंने इसे अपना प्रतिपाद्य विषय भी बनाया...”
      "शकुन्तला-महाकाव्य” को विद्वान कवि ने नौ सर्गों में विभाजित किया है और इनको समुल्लास का नाम दिया है।
       प्रथम समुल्लास में शब्द ब्रह्म की वन्दना करते हुए-मालिनी नदी, कण्वआश्रम, महर्षि कण्व, गौतमी, शकुन्तला एसं अन्य पात्रों का सजीव चित्रण किया है-
"हे शब्दब्रह्म विनती तुमसे,
नतमस्तक होकर करता हूँ।
स्वीकार करो मम् वन्दन को,
मैं पाँव तुम्हारे पड़ता हूँ।।"
--
"वन्दन करता उस कुटिया का,
जो कण्व ऋषि का आश्रम है।
मालिनी नाम की नदिया का,
जिसके समीप ये आश्रम है।।"
--
अतिशय सुन्दर कन्या ऋषि की,
शकुन्तला वहाँ ही रहती थी।
माता से हीन जन्म से थी,
कुटिया में सुख से रहती थी।।“
--
“गौतम, हरीत, शारद्वत् भी,
उस कुटिया में निवास करता।
जिसका जुबान पर वाग्-देवता,
क्षण-प्रतिक्षण निवास करता।।“
--
       द्वितीय समुल्लास में कवि ने दुस्यन्त का कण्व ऋषि आश्रम में आना, दुष्यन्त एक शकुन्तला के मन में प्रेम का उद्भव एवं दुष्यन्त का पुरी जाने के वत्तान्त को काव्य में बाँधा है-
“पुरुवंशी हस्तिना पुरी में,
राजा जन निवास करते।
सबकी रक्षा का भार उठा,
अपने कन्धों पर घरते।।
--
दुष्यन्त नाम के राज भी,
राज वहाँ पर रजते थे।
रणवीर और पराक्रमी थे,
ईश्वर को नित भजते थे।।"
--
       तृतीय समुल्लास में गौतमा द्वारा दु,यन्त को बुलवाने और उसके विरह का वर्णन सरस छन्दों में किया गया है।
“माँ गौतमी ने अपना
निर्णय उन्हें सुनाया।
दो ऋषिकुमार जायें,
निज पास में बुलाया।।
--
बोलीं हे ऋषि कुमारों,
अतिशीघ्र लौट आना।
राजा से तुम यहाँ की,
सारी व्यथा बताना।।"
       चतुर्थ समुल्लास में दुष्यन्त का आश्रम में आगमन तथा शकुन्तला-दुष्यन्त के विवाह का चित्र खींचा गया है।
"राजा ने मन्त्रीवर को,
सानिध्य में बुलाया।
चलना है अभी कुटी में,
अवगत उन्हें कराया।।"
     पञ्चम् समुल्लास में शकुन्तला की विरह व्यथा, महर्षि कण्व का आगमन और साक्ष्य बनकर दोनों के विवाह का अनुमोदन करना-
“दिवस ऐसे बहुत से गुजरते,
कुछ पता न चलता लृपति का।
अब तक न कोई पाती आयी,
हाल कैसे भला है नृपति का।।"
        षष्ठ समुल्लास में शकुन्तला की आश्रम से विदायी का वर्णन है।
“बताओ बात आश्रम में,
विदायी की शकुन्तल के।
करो सब लोग तैयारी,
विदायी की शकुन्तल के।।"
         सप्तम् समुल्लास में शकुन्तला का राजसभा में जाना और साक्ष्य न प्रस्तुत करने का सशक्त भाषा में उल्लेख किया गया है।
“शिष्यों के संग शकुन्तला भी,
सिंह द्वार तक पहुँची।
उसके वहाँ पहुँच जाने की,
बात सभा तक पहुँची।।
--
आदेश हुआ दुष्यन्त राज का,
सभा मध्य तक लाओ।
निराकरण-निरण्य हो जाए,
उसको यहाँ बुलाओ।।"
        अष्टम् समुल्लास में शकुन्तला द्वारा अपने बचपन का वृत्तान्त और पुत्रोत्पत्ति का प्रसंग है।
“विश्वास कर लिया मैंने,
इसने वचन लिया है।
अपना तन-मन-जीवन भी,
मैंने स्वयं दिया है।।"
          इस महाकाव्य के नवम् समुल्लास में दुष्यन्त को मुद्रिका का मिलना और शकुन्तला को पत्नी स्वीकार करके पुरी में लाने का सार्थ वर्णन है।
“पाया आदेश लाकर दिया मुद्रिका,
देख दुष्यन्त विस्मित आकुल हो गया।
जैसे सर्वस्व था अब तलक पाश् में,
एक क्षण में ही लगता सकल खो गया।।
--
हो गयी भूल मुझसे न पहचान की,
थी शकुन्तल वही अब कहाँ खो गयी।
ये अँगूठी स्वयं मैंने दी थी उसे,
जो दिखा न सकी वो कहाँ खो गयी।।"
--
          महाकाव्य के अन्तिम पद्य में कवि लिखता है-
“शब्द नैवैद्य अरु भाव की आरती,
करता छन्दों को अर्पित सुपम मैं तुम्हें।
आपका सौम्य सानिध्य मिलता रहे,
कर रहा ब्रह्म फिर-फिर नमन मैं तुम्हें।।
        छन्दों की दृष्टि से देखा जाये तो यद्यपि इस काव्यसंग्रह में छन्दों में शब्दों की पुनरावृत्ति हुई है लेकिन महाकाव्य लिखना सबके बस की बात नहीं होती है। इस पिस्तक का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है कि यह महाकाव्य अपनी पुरातन ऐतिहासिक धरोहर को अपने में समेटे हुए है।
       शकुन्तला महाकाव्य से पाठकों को अपने विस्मृत इतिहास को जानने का अवसर अवश्य मिलेगा ऐसी मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास भी है।
           अन्त में इतना ही कहूँगा कि शकुन्तला महाकाव्य एक पठनीय और संग्रहणीय काव्यसंकलन है।
        मेरा विश्वास है कि शकुन्तला महाकाव्य सभी वर्गों के पाठकों में चेतना जगाने में सक्षम सिद्ध होगा। इसके साथ ही मुझे आशा है कि यह काव्य संग्रह समीक्षकों की दृष्टि से भी उपादेय सिद्ध होगा।
    “शकुन्तला महाकाव्य” जयप्रकाश चतुर्वेदी जी के पते ग्राम-चौबेपुर (जाना बाजार), पोस्ट-खपराडीह, तहसील-बीकापुर, जिला फैजाबाद (उत्तर-प्रदेश) से प्राप्त किया जा सकता है।
इनके सम्पर्क नम्बर – 9936955486, 9415206296 पर फोन करके आप विस्तृत जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
शुभकामनाओं के साथ!
समीक्षक
 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक’)
कवि एवं साहित्यकार 
टनकपुर-रोडखटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262 308
E-Mail .  roopchandrashastri@gmail.com
फोन-(05943) 250129 मोबाइल-09997996437

कृपया नापतोल.कॉम से कोई सामन न खरीदें।

मैंने Napptol.com को Order number- 5642977
order date- 23-12-1012 को xelectron resistive SIM calling tablet WS777 का आर्डर किया था। जिसकी डिलीवरी मुझे Delivery date- 11-01-2013 को प्राप्त हुई। इस टैब-पी.सी में मुझे निम्न कमियाँ मिली-
1- Camera is not working.
2- U-Tube is not working.
3- Skype is not working.
4- Google Map is not working.
5- Navigation is not working.
6- in this product found only one camera. Back side camera is not in this product. but product advertisement says this product has 2 cameras.
7- Wi-Fi singals quality is very poor.
8- The battery charger of this product (xelectron resistive SIM calling tablet WS777) has stopped work dated 12-01-2013 3p.m. 9- So this product is useless to me.
10- Napptol.com cheating me.
विनीत जी!!
आपने मेरी शिकायत पर करोई ध्यान नहीं दिया!
नापतोल के विश्वास पर मैंने यह टैबलेट पी.सी. आपके चैनल से खरीदा था!
मैंने इस पर एक आलेख अपने ब्लॉग "धरा के रंग" पर लगाया था!

"नापतोलडॉटकॉम से कोई सामान न खरीदें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जिस पर मुझे कई कमेंट मिले हैं, जिनमें से एक यह भी है-
Sriprakash Dimri – (January 22, 2013 at 5:39 PM)

शास्त्री जी हमने भी धर्मपत्नी जी के चेतावनी देने के बाद भी
नापतोल डाट काम से कार के लिए वैक्यूम क्लीनर ऑनलाइन शापिंग से खरीदा ...
जो की कभी भी नहीं चला ....ईमेल से इनके फोरम में शिकायत करना के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला ..
.हंसी का पात्र बना ..अर्थ हानि के बाद भी आधुनिक नहीं आलसी कहलाया .....
--
मान्यवर,
मैंने आपको चेतावनी दी थी कि यदि आप 15 दिनों के भीतर मेरा प्रोड्कट नहीं बदलेंगे तो मैं
अपने सभी 21 ब्लॉग्स पर आपका पर्दाफास करूँगा।
यह अवधि 26 जनवरी 2013 को समाप्त हो रही है।
अतः 27 जनवरी को मैं अपने सभी ब्लॉगों और अपनी फेसबुक, ट्वीटर, यू-ट्यूब, ऑरकुट पर
आपके घटिया समान बेचने
और भारत की भोली-भाली जनता को ठगने का विज्ञापन प्रकाशित करूँगा।
जिसके जिम्मेदार आप स्वयं होंगे।
इत्तला जानें।