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रविवार, जुलाई 31, 2011

"उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के जन्म-दिवस पर विशेष"


मुंशी प्रेमचन्द का जीवन परिचय 
(Premchand's Biography)
जन्म-
प्रेमचन्द का जन्म ३१ जुलाई सन् १८८० को बनारस शहर से चार मील दूर लमही गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम अजायब राय था। वह डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे।जीवन धनपतराय की उम्र जब केवल आठ साल की थी तो माता के स्वर्गवास हो जाने के बाद से अपने जीवन के अन्त तक लगातार विषम परिस्थितियों का सामना धनपतराय को करना पड़ा। पिताजी ने दूसरी शादी कर ली जिसके कारण बालक प्रेम व स्नेह को चाहते हुए भी ना पा सका। आपका जीवन गरीबी में ही पला। कहा जाता है कि आपके घर में भयंकर गरीबी थी। पहनने के लिए कपड़े न होते थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता था। इन सबके अलावा घर में सौतेली माँ का व्यवहार भी हालत को खस्ता करने वाला था।
शादी-
आपके पिता ने केवल १५ साल की आयू में आपका विवाह करा दिया। पत्नी उम्र में आपसे बड़ी और बदसूरत थी। पत्नी की सूरत और उसके जबान ने आपके जले पर नमक का काम किया। आप स्वयं लिखते हैं, "उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया।......." उसके साथ - साथ जबान की भी मीठी न थी। आपने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लिखा है "पिताजी ने जीवन के अन्तिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दिया: मेरी शादी बिना सोंचे समझे कर डाली।" हालांकि आपके पिताजी को भी बाद में इसका एहसास हुआ और काफी अफसोस किया।विवाह के एक साल बाद ही पिताजी का देहान्त हो गया। अचानक आपके सिर पर पूरे घर का बोझ आ गया। एक साथ पाँच लोगों का खर्चा सहन करना पड़ा। पाँच लोगों में विमाता, उसके दो बच्चे पत्नी और स्वयं। प्रेमचन्द की आर्थिक विपत्तियों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट बेचना पड़ा और पुस्तकें बेचनी पड़ी। एक दिन ऐसी हालत हो गई कि वे अपनी सारी पुस्तकों को लेकर एक बुकसेलर के पास पहुंच गए। वहाँ एक हेडमास्टर मिले जिन्होंने आपको अपने स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त किया।
शिक्षा-
अपनी गरीबी से लड़ते हुए प्रेमचन्द ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के आरंभ में आप अपने गाँव से दूर बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। इसी बीच पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वकील बनना चाहते थे। मगर गरीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने - जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था। पाँच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को और दो रुपये से अपनी जिन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। इस दो रुपये से क्या होता महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में मैट्रिक पास किया।साहित्यिक रुचिगरीबी, अभाव, शोषण तथा उत्पीड़न जैसी जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी प्रेमचन्द के साहित्य की ओर उनके झुकाव को रोक न सकी। प्रेमचन्द जब मिडिल में थे तभी से आपने उपन्यास पढ़ना आरंभ कर दिया था। आपको बचपन से ही उर्दू आती थी। आप पर नॉवल और उर्दू उपन्यास का ऐसा उन्माद छाया कि आप बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही सब नॉवल पढ़ गए। आपने दो - तीन साल के अन्दर ही सैकड़ों नॉवेलों को पढ़ डाला। आपने बचपन में ही उर्दू के समकालीन उपन्यासकार सरुर मोलमा शार, रतन नाथ सरशार आदि के दीवाने हो गये कि जहाँ भी इनकी किताब मिलती उसे पढ़ने का हर संभव प्रयास करते थे। आपकी रुचि इस बात से साफ झलकती है कि एक किताब को पढ़ने के लिए आपने एक तम्बाकू वाले से दोस्ती करली और उसकी दुकान पर मौजूद "तिलस्मे - होशरुबा" पढ़ डाली।अंग्रेजी के अपने जमाने के मशहूर उपन्यासकार रोनाल्ड की किताबों के उर्दू तरजुमो को आपने काफी कम उम्र में ही पढ़ लिया था। इतनी बड़ी - बड़ी किताबों और उपन्यासकारों को पढ़ने के बावजूद प्रेमचन्द ने अपने मार्ग को अपने व्यक्तिगत विषम जीवन अनुभव तक ही महदूद रखा।तेरह वर्ष की उम्र में से ही प्रेमचन्द ने लिखना आरंभ कर दिया था। शुरु में आपने कुछ नाटक लिखे फिर बाद में उर्दू में उपन्यास लिखना आरंभ किया। इस तरह आपका साहित्यिक सफर शुरु हुआ जो मरते दम तक साथ - साथ रहा।प्रेमचन्द की दूसरी शादीसन् १९०५ में आपकी पहली पत्नी पारिवारिक कटुताओं के कारण घर छोड़कर मायके चली गई फिर वह कभी नहीं आई। विच्छेद के बावजूद कुछ सालों तक वह अपनी पहली पत्नी को खर्चा भेजते रहे। सन् १९०५ के अन्तिम दिनों में आपने शीवरानी देवी से शादी कर ली। शीवरानी देवी एक विधवा थी और विधवा के प्रति आप सदा स्नेह के पात्र रहे थे।यह कहा जा सकता है कि दूसरी शादी के पश्चात् आपके जीवन में परिस्थितियां कुछ बदली और आय की आर्थिक तंगी कम हुई। आपके लेखन में अधिक सजगता आई। आपकी पदोन्नति हुई तथा आप स्कूलों के डिप्टी इन्सपेक्टर बना दिये गए। इसी खुशहाली के जमाने में आपकी पाँच कहानियों का संग्रह सोजे वतन प्रकाश में आया। यह संग्रह काफी मशहूर हुआ।
व्यक्तित्व-
सादा एवं सरल जीवन के मालिक प्रेमचन्द सदा मस्त रहते थे। उनके जीवन में विषमताओं और कटुताओं से वह लगातार खेलते रहे। इस खेल को उन्होंने बाजी मान लिया जिसको हमेशा जीतना चाहते थे। अपने जीवन की परेशानियों को लेकर उन्होंने एक बार मुंशी दयानारायण निगम को एक पत्र में लिखा "हमारा काम तो केवल खेलना है- खूब दिल लगाकर खेलना- खूब जी- तोड़ खेलना, अपने को हार से इस तरह बचाना मानों हम दोनों लोकों की संपत्ति खो बैठेंगे। किन्तु हारने के पश्चात् - पटखनी खाने के बाद, धूल झाड़ खड़े हो जाना चाहिए और फिर ताल ठोंक कर विरोधी से कहना चाहिए कि एक बार फिर जैसा कि सूरदास कह गए हैं, "तुम जीते हम हारे। पर फिर लड़ेंगे।" कहा जाता है कि प्रेमचन्द हंसोड़ प्रकृति के मालिक थे। विषमताओं भरे जीवन में हंसोड़ होना एक बहादुर का काम है। इससे इस बात को भी समझा जा सकता है कि वह अपूर्व जीवनी-शक्ति का द्योतक थे। सरलता, सौजन्यता और उदारता के वह मूर्ति थे।जहां उनके हृदय में मित्रों के लिए उदार भाव था वहीं उनके हृदय में गरीबों एवं पीड़ितों के लिए सहानुभूति का अथाह सागर था। जैसा कि उनकी पत्नी कहती हैं "कि जाड़े के दिनों में चालीस - चालीस रुपये दो बार दिए गए दोनों बार उन्होंने वह रुपये प्रेस के मजदूरों को दे दिये। मेरे नाराज होने पर उन्होंने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि हमारे प्रेस में काम करने वाले मजदूर भूखे हों और हम गरम सूट पहनें।"प्रेमचन्द उच्चकोटि के मानव थे। आपको गाँव जीवन से अच्छा प्रेम था। वह सदा साधारण गंवई लिबास में रहते थे। जीवन का अधिकांश भाग उन्होंने गाँव में ही गुजारा। बाहर से बिल्कुल साधारण दिखने वाले प्रेमचन्द अन्दर से जीवनी-शक्ति के मालिक थे। अन्दर से जरा सा भी किसी ने देखा तो उसे प्रभावित होना ही था। वह आडम्बर एवं दिखावा से मीलों दूर रहते थे। जीवन में न तो उनको विलास मिला और न ही उनको इसकी तमन्ना थी। तमाम महापुरुषों की तरह अपना काम स्वयं करना पसंद करते थे।ईश्वर के प्रति आस्थाजीवन के प्रति उनकी अगाढ़ आस्था थी लेकिन जीवन की विषमताओं के कारण वह कभी भी ईश्वर के बारे में आस्थावादी नहीं बन सके। धीरे - धीरे वे अनीश्वरवादी से बन गए थे। एक बार उन्होंने जैनेन्दजी को लिखा "तुम आस्तिकता की ओर बढ़े जा रहे हो - जा रहीं रहे पक्के भग्त बनते जा रहे हो। मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।"मृत्यू के कुछ घंटे पहले भी उन्होंने जैनेन्द्रजी से कहा था - "जैनेन्द्र, लोग ऐसे समय में ईश्वर को याद करते हैं मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।"प्रेमचन्द की कृतियाँप्रेमचन्द ने अपने नाते के मामू के एक विशेष प्रसंग को लेकर अपनी सबसे पहली रचना लिखी। १३ साल की आयु में इस रचना के पूरा होते ही प्रेमचन्द साकहत्यकार की पंक्ति में खड़े हो गए। सन् १८९४ ई० में "होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात" नामक नाटक की रचना की। सन् १८९८ में एक उपन्यास लिखा। लगभग इसी समय "रुठी रानी" नामक दूसरा उपन्यास जिसका विषय इतिहास था की रचना की। सन १९०२ में प्रेमा और सन् १९०४-०५ में "हम खुर्मा व हम सवाब" नामक उपन्यास लिखे गए। इन उपन्यासों में विधवा-जीवन और विधवा-समस्या का चित्रण प्रेमचन्द ने काफी अच्छे ढंग से किया। जब कुछ आर्थिक निर्जिंश्चतता आई तो १९०७ में पाँच कहानियों का संग्रह सोड़ो वतन (वतन का दुख दर्द) की रचना की। जैसा कि इसके नाम से ही मालूम होता है, इसमें देश प्रेम और देश को जनता के दर्द को रचनाकार ने प्रस्तुत किया। अंग्रेज शासकों को इस संग्रह से बगावत की झलक मालूम हुई। इस समय प्रेमचन्द नायाबराय के नाम से लिखा करते थे। लिहाजा नायाब राय की खोज शुरु हुई। नायाबराय पकड़ लिये गए और शासक के सामने बुलाया गया। उस दिन आपके सामने ही आपकी इस कृति को अंग्रेजी शासकों ने जला दिया और बिना आज्ञा न लिखने का बंधन लगा दिया गया।इस बंधन से बचने के लिए प्रेमचन्द ने दयानारायण निगम को पत्र लिखा और उनको बताया कि वह अब कभी नयाबराय या धनपतराय के नाम से नहीं लिखेंगे तो मुंशी दयानारायण निगम ने पहली बार प्रेमचन्द नाम सुझाया। यहीं से धनपतराय हमेशा के लिए प्रेमचन्द हो गये।"सेवा सदन", "मिल मजदूर" तथा १९३५ में गोदान की रचना की। गोदान आपकी समस्त रचनाओं में सबसे ज्यादा मशहूर हुई अपनी जिन्दगी के आखिरी सफर में मंगलसूत्र नामक अंतिम उपन्यास लिखना आरंभ किया। दुर्भाग्यवश मंगलसूत्र को अधूरा ही छोड़ गये। इससे पहले उन्होंने महाजनी और पूँजीवादी युग प्रवृत्ति की निन्दा करते हुए "महाजनी सभ्यता" नाम से एक लेख भी लिखा था।
मृत्यु-
सन् १९३६ ई० में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। अपने इस बीमार काल में ही आपने "प्रगतिशील लेखक संघ" की स्थापना में सहयोग दिया। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण ८ अक्टूबर १९३६ में आपका देहान्त हो गया। और इस तरह वह दीप सदा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण-कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया।
(भारत दर्शन से साभार)

बुधवार, जुलाई 20, 2011

"बिन झोली के फकीर-2" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मेरी प्यारी जूली
गतांक से आगे....

          कालान्तर में जूली ने 4 छोटे-छोटे पिल्लों को जन्म दिया। जिसमें से एक तो जन्म के बाद ही चल बसा। एक पेयर मेरे मित्र डॉ. दत्ता ने ले लिया और एक पिल्ला हमने अपने पास रख लिया। प्यार से उसका नाम पिल्लू रखा गया। यह हल्के ब्राउन रंग का था। जूली की तरह इसके बड़े बाल नहीं थे। इसको अधिक कुछ हमें सिखान भी नहीं पड़ा। क्योंकि यह अपनी माँ को देख-देखकर खुद ही काफी कुछ सीख गया था
     घर वालों को यह ज्यादा अच्छा नहीं लगता था क्योंकि यह अपनी माँ की तरह बड़े बालों वाला नहीं था। मेरी माता जी तो इसे बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थीं और इसे कूड़ा चुगने वाला कुत्ता बतातीं थीं!
एक दिन एक मनीहार चूड़ी पहनाने के लिए बनबसा आया तो माता जी ने कहा कि भैया इस कुत्ते को अपने घर ले जा। मनीहार ने कहा कि माता जी इसको चेन मे बाँधकर मुझे दे दो।
माता जी ने पिल्लू को चेन में बाँधकर मनीहार के हाथ में चेन थमा दी। जब तक माता जी पिल्लू को दिखाई देती रहीं तब तक तो पिल्लू कुछ नही बोला मगर जैसे ही मनीहार इसे लेकर चला तो पिल्लू ने उसे 2-3 जगह काट लिया। जैसे-तैसे वह पिल्लू की चेन छोड़कर चलता बना।
     जब पिल्लू 6 महीने का हा तो इसकी माँ जूली को जलोदर रोग हो गया और वह 2 महीने में चल बसी। कुछ दिनों तक तो पिल्लू बहुत परेशान रहा मगर अब यह पहले से ज्यादा समझदार हो गया था।
     उन दिनों मैंने एक बीघा का प्लॉट खटीमा में ले लिया था और इसको बनाने के ले काम शुरू कर दिया था। पिता जी खटीमा में ही रहने लगे थे। माता जी ने पिल्लू को भी पिता जी के साथ खटीमा भेज दिया था। सुबह एक बार 8 बजे मैं भी बनवसा से खटीमा का चक्कर लगा आता ता और राज-मिस्त्रियों को काम समझा आता था।
     पिल्लू मुझे देखकर बहुत खुश हो जाता था। जिस किसी दिन खटीमा के प्लॉट पर कोई नहीं होता था तो पिल्लू पूरी मुस्तैदी से सारे सामान की देखभाल करता था। सुबह को जब राज मिस्त्री काम पर आते थे तो क्या मजाल थी कि यह प्लॉट में घुस जाएँ। पिल्लू मोटी-मोटी बल्लियों को मुँह में दबा कर बैठ जाता और किसी को हाथ भी नहीं लगाने देता था।
     जब मैं या पिता जी आते थे तो यह सामान्य हो जाता था और राज-मजदूर अपने काम पर लग जाते थे।
     करीब तीन महीने बाद खटीमा में 3 दूकाने और रहने के लिए 3 कमरे तैयार हो गये थे। अतः हम लोग भी बनबसा से खटीमा में ही शिफ्ट हो गये थे। पिल्लू बाहर गेट के पास ही रहता था और हम लोग चैन की नींद सोते थे।
     उन दिनों बाहर का आँगन कच्चा ही था और उसमें ईंटें बिछी हुई थी। अतः गर्मियों में मेरे पिता जी बाहर गन में चारपाई डालकर सोते थे। पिल्लू उनकी चारपाई के नीचे पड़ा रहता था।
     मैं प्रतिदिन सुबह 4 बजे उठकर घूमने के लिए जाता था और पिल्लू मेरे साथ-साथ चल पड़ता था। एक दिन मैं जब उठकर घूमने के लिए जा रहा था तो देखा कि कि पिता जी की चारपाई से कुछ दूर एक साँप लहूलुहान मरा पड़ा था तो मुझे यह समझते हुए देर न लगी कि पिल्लू ने ही यह सब किया होगा।
     इस वफादार ने अपनी जान की परवाह न करते हुए साँप को मार डाला और मेरे पिता जी रक्षा की।
     ऐसे होते हैं ये बिन झोली के फकीर।
     मालिक के वफादार और सच्चे चौकीदार।।
क्रमशः..........

रविवार, जून 26, 2011

"बिन झोली के फकीर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मेरी प्यारी जूली
बात 1975 की है! मैं नया-नया बनबसा में आकर बसा था। किराये का मकान था और कुत्ता पालने का शौक भी चर्राया हुआ था। इसलिए मैं अपने एक गूजर मित्र के यहाँ गया और उसके यहाँ से भोटिया नस्ल का प्यारा सा पिल्ला ले आया।
बहुत प्यार से इसे एक दिन रखा मगर मकान मलिक से मेरा यह शौक देखा न गया। मुझे वार्निंग मिल गई कि कुत्ता पालना है तो कोई दूसरा मकान देखो!
अतः मन मार कर मैं इसे दूसरे दिन अपने गूजर मित्र को वापिस कर आया।
अब तो मन में धुन सवार हो गई कि अपना ही मकान बनाऊँगा। उस समय जैसे तैसे पाँच हजार रुपये का इन्तजाम किया और कैनाल रोड पर एक प्लॉट ले लिया। दो माह में दो कमरों का प्लैट बना लिया और उसके आगे की ओर अपना क्लीनिक भी बना लिया।
उस समय बनबसा पशु चिकित्सालय में डॉ.ब्रह्मदत्त पशु चिकित्साधिकारी थे। उनसे मेरी दोस्ती हो गई थी। एक दिन जब मैं उनके घर गया तो देखा कि उनके यहाँ 3 पामेरियन नस्ल के पिल्ले खेल रहे थे। मैने उनसे अपने लिए एक पिल्ला माँगा तो उन्होंने कहा कि डॉ. साहब एक पेयर तो मैं अपने पास रखूँगा। इसके बाद एक पिल्ली बचती है इसे आप ले जाइए।
मैंने अपने वर कोट की जेब में इस प्यारी सी पिलिया को रखा और अपने घर आ गया। छोटी नस्ल की यह पिलिया सबको बहुत पसंद आई और इसका नाम जूली रखा गया।
उन दिनों कुकिंग गैस नहीं थी इसलिए घर में चूल्हा ही जलता था। बनबसा में लकड़ियों की भी भरमार थी। जाड़े के दिनों में मैं चूल्हे के आगे बैठकर जूली को सौ-सौ बार नमस्ते करना और 1-2-5-10-100 के नोट पहचानना बताता था।
जूली बहुत तेज दिमाग की थी जिसके कारण उसने बहुत जल्दी ही सब कुछ याद कर लिया था।
जूली को ग्लूकोज के बिस्कुट खाना बहुत पसंद था और यह मेरे प्रिया स्कूटर की बास्केट में बैठी रहती थी।
उन दिनों नेपाल में जाने और बाहन ले जाने के लिए कोई लिखा-पढ़ी या टैक्स नहीं लगता था। मैं रोगी देखने के ले प्रतिदिन ही नेपाल के एक दो गाँवों में जाता रहता था।
     एक दिन एक नेपाली मुझे बुलाने के लिए आया। वह पहले ही अपनी साइकिल से चल पड़ा था और गड्डा चौकी में उसको मेरी इन्तजार करनी थी। अब मैं उसके गाँव बाँसखेड़ा के लिए चल पड़ा।
जैसे ही शारदा बैराज पार किया रास्ते में एक काली गाय बहुत ही खूँख्वार बनकर मेरे स्कूटर की ओर बढ़ी। मुझे स्कूटर रोक देना पड़ा। इतने में तपाक से जूली बास्केट में से छलाँग लगा कर उस गाय के पीछे पड़ गई। वह बार-बार गाय की पूँछ पकड़ कर उसको काट लेती थी। अन्ततः गाय को भागना पड़ा। और मैं सुरक्षित गड्डाचौकी पहुँच गया।
मुझे तो अनुमान भी न था कि मेरे स्कूटर की बास्केट में जूली बैठी है। 
इतने वफादार होते हैं यह बिन झोली के फकीर। जो मालिक की जान की रक्षा अपनी जान पर खेलकर भी हर हाल में करते हैं।
क्रमशः........................

गुरुवार, जून 16, 2011

"फोटो फीचर-बाबा नागार्जुन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

♥ फोटोफीचर ♥
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आज से 36 साल पहले भी मेरी यही छोटी सी दुनिया थी
और आज भी यही है! अन्तर इतना आया है कि 
अब बेटे के भी दो बच्चे प्रांजल ओर प्राची हैं।
मेरे सिर पर माता-पिता जी का साया तब भी था 
और आज भी है!
 छोटा पुत्र विनीत और बड़ा पुत्र नितिन 
अपनी मम्मी को बहुत चाहते हैं
 बाबा जी को भी अपने पौत्रों पर नाज़ है
 पुत्रवधु भी अच्छी मिली है!
---
सन् 1989 का जून जुलाई का महीना मेरे जीवन के लिए
आज भी अविस्मरणीय  है!
बाबा नागार्जुन को स्कूटर पर बैठाकर सैर कराना! 
उनके साथ घंटों बतियाना!
कुछ अपनी कहना और कुछ उनकी सुनना!
बाबा के पास लोगों के मिलने का ताँता लगा रहता था!
सारा परिवार बाबा के साथ बहुत खुश रहता था!
मेरे पिता जी श्री घासीराम आर्य 
और दोनों पुत्रों के साथ बाबा घूम भी लेते थे!
बच्चों से तो बाबा बहुत घुल-मिल जाते थे!
इस दौरान कई कवि गोष्ठिया भी 
बाबा के् सम्मान में आयोजित की गईं!
बाबा को शॉल और मालाओं से 
सम्मानित भी तो किया गया था!
मुझे आज भी याद है कि खटीमा बस स्टेशन पर
मैं ही बाबा को दिल्ली की बस में बैठाने आया था!
यह है बाबा का पत्र मेरे नाम
जो उन्होंने दिल्ली से मुझे लिखा था!
 आर्य समाज के बारे में बाबा का क्या मत था!
यह आलेख मैंने "उत्तर-उजाला" में लिखा था!
सदी के जनकवि और साहित्यकार
बाबा नागार्जुन को मैं 
उनकी 101वीं जयन्ती पर
कोटि-कोटि नमन करता हूँ!

शुक्रवार, जून 10, 2011

"झूठे मन्दिर की कथा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

♥ झूठे मन्दिर की कथा ♥
जिला चम्पावत में पूर्णागिरि के शैलशिखर पर
माता पूर्णागिरि विराजमान हैं
और कलकल निनाद करती हुई शारदा की पावन धारा
माँ के चरण पखार रही है!
-♥-
♥ झूठे का चढ़ाया हुआ मन्दिर ♥
-♥-
माँ पूर्णागिरि के महात्मय को सुनकर
प्राचीन समय में एक सेठ जी ने माता के दरबार में आकर 
पुत्र की कामना की और प्रण किया कि 
मेरे घर मे पुत्र का जन्म होगा तो 
माता को सोने का मन्दिर भेंट करूँगा! 
माता की कृपा से उसके घर एक पुत्र ने जन्म लिया 
तब उसने ताम्बे का यह मन्दिर बनवाया।

सोने जैसा दिखाई देने के लिए
सेठ जी ने इस पर सोने का पानी चढ़वा कर 
माता के दरबार में चढ़ाने के लेकर चल पड़ा!
उस समय माता जी के दरबार में जाने के लिए
मार्ग बहुत दुर्गम था।
इसलिए सेवकों ने टुन्नास नामक स्थान पर 
इसको रख दिया और विश्राम करने लगे।
लेकिन जब विश्राम करने के बाद 
सेवक इसको उठाने लगे तो  
यह मन्दिर उनके तथा सेठ के 
बहुत प्रयास करने पर भी यहाँ से उठा ही नही! 
क्योंकि माता को झूठे की यह भेंट स्वीकार नहीं की थी
तब से यह यहीं पर धरा हुआ है!

गुरुवार, मई 26, 2011

"पिकनिक में मामा-मामी उपहार में मिले" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


पिकनिक में मामा-मामी उपहार में मिले!
यह बात 1966 की है। उन दिनों मैं कक्षा 11 में पढ़ रहा था। परीक्षा हो गईं थी और पूरे जून महीने की छुट्टी पड़ गई थी। इसलिए सोचा कि कहीं घूम आया जाए। तभी संयोगवश् मेरे मामा जी हमारे घर आ गये। वो उन दिनों जिला पिथौरागढ़ में ठेकेदारी करते थे। उन दिनों मोटरमार्ग तो थे ही नहीं इसलिए पहाड़ों के दुर्गम स्थानों पर सामान पहुँचाने का एक मात्र साधन खच्चर ही थे।
मेरे मामा जी के पास उन दिनों 20 खच्चर थीं जो आरएफसी के चावल को दुर्गम स्थानों तक पहुँचातीं थीं। दो खच्चरों के लिए एक नौकर रखा गया था इसलिए एक दर्जन नौकर भी थे। खाना बनाने वाला भी रखा गया था और पड़ाव बनाया गया था लोहाघाट। मैं पढ़ा-लिखा था इसलिए हिसाब-किताब का जिम्मा मैंने अपने ऊपर ही ले लिया था।
मुझे यहाँ कुछ दिनों तक तो बहुत अच्छा लगा। मैं आस-पास के दर्शनीय स्थान मायावती आश्रम और रीठासाहिब भी घूम आया था। मगर फिर लौटकर तो पड़ाव में ही आना था और पड़ाव में रोज-रोज आलू, अरहर-मलक की दाल खाते-खाते मेरा मन बहुत ऊब गया था। हरी सब्जी और तरकारियों के तो यहाँ दर्शन भी दुर्लभ थे। तब मैंने एक युक्ति निकाली जिससे कि मुझे खाना स्वादिष्ट लगने लगे।
मैं पास ही में एक आलूबुखारे (जिसे यहाँ पोलम कहा जाता था) के बगीचे में जाता और कच्चे-कच्चे आलूबुखारे तोड़कर ले आता। उनको सिल-बट्टे पर पिसवाकर स्वादिष्ट चटनी बनवाता और दाल में मिलाकर खाता था। दो तीन दिन तक तो सब ठीक रहा मगर एक दिन बगीचे का मालिक नित्यानन्द मेरे मामा जी के पास आकर बोला ठेकेदार ज्यू आपका भानिज हमारे बगीचे में से कच्चे पोलम रोज तोड़कर ले आता है। मामा जी ने मुझे बुलाकार मालूम किया तो मैंने सारी बता दी।
नित्यानन्द बहुत अच्छा आदमी था। उसने कहा कि ठेकेदार ज्यू तुम्हारा भानिज तो हमारा भी भानिज। आज से यह खाना हमारे घर ही खाया करेगा और मैं नित्यानन्द जी को मामा जी कहने लगा।

उनके घर में अरहर-मलक की दाल तो बनती थी मगर उसके साथ खीरे का रायता भी बनता था। कभी-कभी गलगल नीम्बू की चटनी भी बनती थी। जिसका स्वाद मुझे आज भी याद है। पहाड़ी खीरे का रायता उसका तो कहना ही क्या? पहाड़ में खीरे का रायता विशेष ढंग से बनाया जाता है जिसमें कच्ची सरसों-राई पीस कर मिलाया जाता है जिससे उसका स्वाद बहुत अधिक बढ़ जाता है। ऐसे ही गलगल नीम्बू की चटनी भी मूंगफली के दाने भूनकर-पीसकर उसमें भाँग के बीज पीसकर मिला देते हैं और ऊपर से गलगल नींबू का रस पानी की जगह मिला देते हैं। (भाँग के बीजों में नशा नहीं होता है)
एक महीने तक मैंने चीड़ के वनों की ठण्डी हवा खाई और पहाड़ी व्यंजनों का भी मजा लिया। अब सेव भी पककर तैयार हो गये थे और आलूबुखारे भी। जून के अन्त में जब मैं घर वापिस लौटने लगा तो मामा और मामी ने मुझे घर ले जाने के लिए एक कट्टा भरकर सेव और आलूबुखारे उपहार में दिये।
आज भी जब मामा-मामी का स्मरण हो आता है तो मेरा मन श्रद्धा से अभिभूत हो जाता है।
काश् ऐसी पिकनिक सभी को नसीब हो! जिसमें की मामा-मामी उपहार में मिल जाएँ!
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आज वो पहाड़ी मामा-मामी तो नहीं रहे मगर उनका बेटा नीलू आज भी मुझे भाई जितना ही प्यार करता है।
पहाड़ का निश्छल जीवन देखकर मेरे मन में बहुत इच्छा थी कि मैं भी ऐसे ही निश्छल वातावरण में आकर बस जाऊँ और मेरा यह सपना साकार हुआ 1975 में। मैं पर्वतों में तो नहीं मगर उसकी तराई में आकर बस गया।

शनिवार, मई 07, 2011

"खटीमा मॉर्निंग ने भी अपना दायित्व निभाया"

खटीमा (उत्तराखण्ड) से प्रत्येक बृहस्पतिवार को
प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक समाचारपत्र
5 मई से 11 मई के अंक में
पृष्ठ-10 पर
"खटीमा मॉर्निंग" ने भी
 "कविमंच" पर पूरा पृष्ठ 
मेरे सम्मान में प्रकाशित किया!
(छवि पर क्लिक करिए और पढ़ लीजिए)
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30 अप्रैल, 2011 को हिन्दी भवन, दिल्ली में
सम्मानित होने का समाचार यह है!
(छवि पर क्लिक करिए और पढ़ लीजिए)

कृपया नापतोल.कॉम से कोई सामन न खरीदें।

मैंने Napptol.com को Order number- 5642977
order date- 23-12-1012 को xelectron resistive SIM calling tablet WS777 का आर्डर किया था। जिसकी डिलीवरी मुझे Delivery date- 11-01-2013 को प्राप्त हुई। इस टैब-पी.सी में मुझे निम्न कमियाँ मिली-
1- Camera is not working.
2- U-Tube is not working.
3- Skype is not working.
4- Google Map is not working.
5- Navigation is not working.
6- in this product found only one camera. Back side camera is not in this product. but product advertisement says this product has 2 cameras.
7- Wi-Fi singals quality is very poor.
8- The battery charger of this product (xelectron resistive SIM calling tablet WS777) has stopped work dated 12-01-2013 3p.m. 9- So this product is useless to me.
10- Napptol.com cheating me.
विनीत जी!!
आपने मेरी शिकायत पर करोई ध्यान नहीं दिया!
नापतोल के विश्वास पर मैंने यह टैबलेट पी.सी. आपके चैनल से खरीदा था!
मैंने इस पर एक आलेख अपने ब्लॉग "धरा के रंग" पर लगाया था!

"नापतोलडॉटकॉम से कोई सामान न खरीदें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जिस पर मुझे कई कमेंट मिले हैं, जिनमें से एक यह भी है-
Sriprakash Dimri – (January 22, 2013 at 5:39 PM)

शास्त्री जी हमने भी धर्मपत्नी जी के चेतावनी देने के बाद भी
नापतोल डाट काम से कार के लिए वैक्यूम क्लीनर ऑनलाइन शापिंग से खरीदा ...
जो की कभी भी नहीं चला ....ईमेल से इनके फोरम में शिकायत करना के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला ..
.हंसी का पात्र बना ..अर्थ हानि के बाद भी आधुनिक नहीं आलसी कहलाया .....
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मान्यवर,
मैंने आपको चेतावनी दी थी कि यदि आप 15 दिनों के भीतर मेरा प्रोड्कट नहीं बदलेंगे तो मैं
अपने सभी 21 ब्लॉग्स पर आपका पर्दाफास करूँगा।
यह अवधि 26 जनवरी 2013 को समाप्त हो रही है।
अतः 27 जनवरी को मैं अपने सभी ब्लॉगों और अपनी फेसबुक, ट्वीटर, यू-ट्यूब, ऑरकुट पर
आपके घटिया समान बेचने
और भारत की भोली-भाली जनता को ठगने का विज्ञापन प्रकाशित करूँगा।
जिसके जिम्मेदार आप स्वयं होंगे।
इत्तला जानें।