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बुधवार, सितंबर 14, 2011

"आज हिन्दी दिवस है!" (प्रस्तोता- डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

आज हिन्दी दिवस है!

प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को भारत के लोग हिन्दी दिवस मनाते हैं और हिन्दी के प्रति अपनी श्रद्धा को प्रकट कर देते हैं। उसके बाद पूरे साल वही गिटर-पिटर का टर-टर स्वर आलापते रहते हैं।

आज से 62 वर्ष पूर्व जब महात्मा गांधी जीवित थे 14 सितम्बर, 1949 को भारत की संविधन सभा ने एक मत से निर्णय लिया था कि हिन्दी भारत की राजभाषा कहलाएगी।
इस निर्णय पर राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस मनाया जाने लगा।
स्वतन्त्र भारत की राजभाषा के प्रश्न पर काफी विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया जो भारतीय संविधान के भाग १७ के अध्याय की धारा ३४३(१) में इस प्रकार वर्णित है:
संघ की राज भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी । संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा ।
संविधान में राजभाषा के सम्बन्ध में धारा ३४३ से ३५२ तक की व्यवस्था की गयी। इसकी स्मृति को ताजा रखने के लिये १४ सितम्बर का दिन प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है।
अब हमारी मानसिक दासता को उजागर करता हुआ यह पक्ष भी देख लीजिए!
संसद का कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जा सकता है। परन्तु राज्यसभा के सभापति महोदय या लोकसभा के अध्यक्ष महोदय विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं । {संविधान का अनुच्छेद 120} किन प्रयोजनों के लिए केवल हिंदी का प्रयोग किया जाना है, किन के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग आवश्यक है और किन कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाना है, यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा नियम 1976 और उनके अंतर्गत समय समय पर राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए निदेशों द्वारा निर्धारित किया गया है।
स्वतन्त्रता से पूर्व की गतिविधियाँ
1833-86 : गुजराती के महान कवि श्री नर्मद (1833-86) ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का विचार रखा।
1872 : आर्य समाज के संस्थापक महार्षि दयानंद सरस्वती जी कलकत्ता में केशवचन्द्र सेन से मिले तो उन्होने स्वामी जी को यह सलाह दे डाली कि आप संस्कृत छोडकर हिन्दी बोलना आरम्भ कर दें तो भारत का असीम कल्याण हो। तभी से स्वामी जी के व्याख्यानों की भाषा हिन्दी हो गयी और शायद इसी कारण स्वामी जी ने सत्यार्थ प्रकाश की भाषा भी हिन्दी ही रखी।
1873: महेन्द्र भट्टाचार्य द्वारा पदार्थ विज्ञान की रचना
1877 : श्रद्धाराम फिल्लौरी ने भाग्यवती नामक हिन्दी उपन्यास की रचना की।
1918 : मराठी भाषी लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से घोषित किया कि हिन्दी भारत की राजभाषा होगी।
1918 : महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना
1930 का दशक : हिन्दी टाइपराइटर का विकास (शैलेन्द्र मेहता)
1935 : मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री रूप में सी० राजगोपालाचारी ने हिन्दी शिक्षा को अनिवार्य कर दिया।
स्वतन्त्रता के बाद की गतिविधियाँ
14.9.1949
संविधान सभा ने हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया । इस दिन को अब हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है ।
26.1.1950
संविधान लागू हुआ। तदनुसार उसमें किए गए भाषाई प्रावधान(अनुच्छेद 120, 210 तथा 343 से 351) लागू हुए ।
1952
शिक्षा मंत्रालय द्वारा हिन्दी भाषा का प्रशिक्षण ऐच्छिक तौर पर प्रारम्भ किया गया ।
27.5.1952
राज्यपालों/उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्तियों में अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिन्दी भाषा व भारतीय अंकों के अन्तर्राष्ट्रीय स्वरूप के अतिरिक्त अंकों के देवनागरी स्वरूप का प्रयोग प्राधिकृत किया गया ।
जुलाई, 1955
हिन्दी शिक्षण योजना की स्थापना । केन्द्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों, संबद्ध व अधीनस्थ कर्मचारियों को सेवाकालीन प्रशिक्षण ।
7.6.1955
बी.जी. खेर आयोग का गठन (सं‡वधान के अनुच्छेद 344 (1) के अन्तर्गत)
अक्तूबर,1955
गृह मंत्रालय के अन्तर्गत हिन्दी शिक्षण योजना प्रारम्भ की गई ।
3.12.1955
संविधान के अनुच्छेद 343 ( 2) के परन्तुक द्वारा दी गई शक्तियों का प्रयोग करते हुए संघ के कुछ कार्यों के लिए अंग्रेजी भाषा के अतिरिक्त हिंदी भाषा का प्रयोग किए जाने के आदेश जारी किए गए ।
31.7.1956
खेर आयोग की रिपोर्ट राष्ट्रपति जी को प्रस्तुत की गई ।
1957
खेर आयोग की रिपोर्ट पर विचार हेतु तत्कालीन गृह मंत्री श्री गोविन्द वल्लभ पंत की अध्यक्षता में संसदीय समिति का गठन ।
8.2.1959
संविधान के अनुच्छेद 344 (4) के अन्तर्गत संसदीय समिति की रिपोर्ट राष्ट्रपति जी को प्रस्तुत की गई ।
सितम्बर, 1959
संसदीय समिति की रिपोर्ट पर संसद में बहस । तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा आश्र्वासन दिया गया कि अंग्रेजी को सह-भाषा के रूप में प्रयोग में लाए जाने हेतु कोई व्यावधान उत्पन्न नहीं किया जाएगा और न ही इसके लिए कोई समय-सीमा ही निर्धारित की जाएगी । भारत की सभी भाषाएं समान रूप से आदरणीय हैं और ये हमारी राष्ट्रभाषाएं हैं ।
1960
हिन्दी टंकण, हिन्दी आशुलिपि का अनिवार्य प्रशिक्षण आरम्भ किया गया ।
27.4.1960
संसदीय समिति की रिपोर्ट पर राष्ट्रपति के आदेश जारी किए गए जिनमें हिन्दी शब्दावलियों का निर्माण, संहिताओं व कार्यविधिक साहित्य का हिंदी अनुवाद, कर्मचारियों को हिंदी का प्रशिक्षण, हिंदी प्रचार, विधेयकों की भाषा, उच्चतम न्यायालय व उच्च न्यायालयों की भाषा आदि मुद्दे हैं ।
10.5.1963
अनुच्छेद 343(3) के प्रावधान व श्री जवाहर लाल नेहरू के आ„वासन को ध्यान में रखते हुए राजभाषा अ‡ध‡नयम बनाया गया । इसके अनुसार ‡हन्दी संघ की राजभाषा व अंग्रेजी सह-राजभाषा के रूप में प्रयोग में लाई गई ।
5.9.1967
प्रधान मंत्री की अध्यक्षता में केन्द्रीय हिन्दी समिति का गठन किया गया । यह समिति सरकार की राजभाषा नीति के संबंध में महत्वपूर्ण दिशा-निदेश देने वाली सर्वोच्च समिति है । इस समिति में प्रधानमंत्री जी के अलावा नामित केन्द्रीय मंत्री, कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री, सांसद तथा हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के विद्वान सदस्य के रूप में शामिल किए जाते हैं ।
16.12.1967
संसद के दोनों सदनों द्वारा राजभाषा संकल्प पारित किया गया जिसमें हिन्दी के राजकीय प्रयोजनों हेतु उत्तरोत्तर प्रयोग के लिए अधिक गहन और व्यापक कार्यक्रम तैयार करने, प्रगति की समीक्षा के लिए वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार करने, हिन्दी के साथ -साथ 8वीं अनुसूची की अन्य भाषाओं के समन्वित विकास के लिए कार्यक्रम तैयार करने, त्रिभाषा सूत्र का अपनाये जाने, संघ सेवाओं के लिए भर्ती के समय हिन्दी व अंग्रेजी में से किसी एक के ज्ञान की आवश्यकता अपेक्षित होने तथा संघ लोक सेवा आयोग द्वारा उचित समय पर परीक्षा के लिए संविधान की 8वीं अनुसूची में सम्मिलित सभी भाषाओं तथा अंग्रेजी को वैकल्पिक माध्यम के रूप में रखने की बात कही गई है । (संकल्प 18.8,1968 को प्रकाशित हुआ)
1967
सिंधी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित की गई ।
8.1.1968
राजभाषा अधिनियम, 1963 में संशोधन ‡कए गए । तदनुसार धारा 3 (4) में यह प्रावधान ‡कया गया कि हिंदी में या अंग्रेजी भाषा में प्रवीण संघ सरकार के कर्मचारी प्रभावी रूप से अपना काम कर सकें तथा केवल इस आधार पर कि वे दोनों ही भाषाओं में प्रवीण नहीं हैं, उनका कोई अहित न हो । धारा 3 (5) के अनुसार संघ के राजकीय प्रयोजनों में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग समाप्त कर देने के लिए आव„यक है कि सभी राज्यों के विधान मण्डलों द्वारा( जिनकी राजभाषा हिंदी नहीं है ) ऐसे संकल्प पारित ‡कए जाएं तथा उन संकल्पों पर विचार करने के पश्चात अंग्रेजी भाषा का प्रयोग समाप्त करने के लिए संसद के हरेक सदन द्वारा संकल्प पारित ‡कया जाए ।
1968
राजभाषा संकल्प 1968 में किए गए प्रावधान के अनुसार वर्ष 1968-69 से राजभाषा हिन्दी में कार्य करने के लिए विभिन्न मदों के लक्ष्य निर्धारित किए गए तथा इसके लिए वार्षिक कार्यक्रम तैयार किया गया ।
1.3.1971
केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो का गठन ।
1973
केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो के दिल्ली स्थिति मुख्यालय में एक प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना ।
1974
तीसरी श्रेणी के नीचे के कर्मचारियों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों तथा कार्य प्रभारित कर्मचारियों को छोड़कर केन्द्र सरकार के कर्मचारियों के साथ-साथ केन्द्र सरकार के स्वामित्व एवं नियंत्रणाधीन निगमों, उपक्रमों, बैंकों आदि के कर्मचारियों व अधिकारियों के लिए हिन्दी भाषा, टंकण एवं आशुलिपि का अनिवार्य प्रशिक्षण ।
जून, 1975
राजभाषा से संबंधित संवैधानिक, विधिक उपबंधों के कार्यान्वयन हेतु राजभाषा विभाग का गठन किया गया ।
1976
राजभाषा नियम बनाए गए ।
1976
संसदीय राजभाषा समिति का गठन । तब से अब तक समिति ने अपनी रिपोर्ट के 8 भाग प्रस्तुत किए हैं जिनमें से प्रथम 7 पर राष्ट्रपति के आदेश जारी हो गए हैं । आठवें खण्ड में की गई संस्तुतियों पर मंत्रालयों व राज्य सरकारों की टिप्पणी प्राप्त की जा रही है ।
1977
श्री अटल बिहारी वाजपेयी, तत्कालीन विदेश मंत्री ने पहली बार संयुक्त राष्ट्र की आम सभा को हिंदी में संबोधित किया ।
1981
केन्द्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा संवर्ग का गठन किया गय ।
25.10.1983
केन्द्रीय सरकार के मंत्रालयों, विभागों, सरकारी उपक्रमों, राष्ट्रीयकृत बैंकों में यांत्रिक और इलेक्ट्रानिक उपकरणों द्वारा हिन्दी में कार्य को बढ़ावा देने तथा उपलब्ध द्विभाषी उपकरणों के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से राजभाषा विभाग में तकनीकी कक्ष की स्थापना की गई ।
21.8.1985
केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान का गठन कर्मचारियों/अधिकारियों को हिन्दी भाषा, हिन्दी टंकण और हिन्दी आशुलिपि के पूर्णकालिक गहन प्रशिक्षण सुविधा उपलब्ध कराने के लिए किया गया ।
1986
कोठारी शिक्षा आयोग की रिपोर्ट। 1968 में पहले ही यह सिफारिश की जा चुकी थी कि भारत में शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं होनी चाहिए । उच्च शिक्षा के माध्यम के संबंध में नई शिक्षा नीति (1986) के कार्यान्वयन - कार्यक्रम में कहा गया - “ स्कूल स्तर पर आधुनिक भारतीय भाषाएं पहले ही शिक्षण माध्यम के रूप में प्रयुक्त हो रही हैं । आवश्यकता इस बात की है ‡क विश्वविद्यालय के स्तर पर भी इन्हें उत्तरोत्तर माध्यम के रूप में अपना ‡लया जाए । इसके लिए अपेक्षा यह है कि राज्य सरकारें, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से परामर्श करके, सभी विषयों में और सभी स्तरों पर शिक्षण माध्यम के रूप में उत्तरोत्तर आधुनिक भारतीय भाषाओं को अपनाएं।”
1986-87
इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार प्रारम्भ किए गए ।
9.10.1987
राजभाषा नियम, 1976 में संशोधन किए गए ।
1988
विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेम्बली में तत्कालीन विदेश मंत्री श्री नरसिंह राव जी हिंदी में बोले ।
1992
कोंकणी, मणिपुरी व नेपाली भाषाएं संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित की गई ।
14.9.1999
संघ की राजभाषा हिंदी की स्वर्ण जयंती मनाई गई ।
24.1.2000
राजभाषा विभाग का पोर्टल का लोकार्पण माननीय गृह मंत्री जी द्वारा किया गया जिसमें विभाग से संबं‡धत विभिन्न जानकारियां द्विभाषिक रूप में उपलब्ध कराई गई ।
20.10.2000
राष्ट्रीय ज्ञान विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार वर्ष 2001-02 से आरंभ करने की घोषणा की गई जिसमें निम्न पुरस्कार राशियां हैं :-
(1) प्रथम प्ररस्कार - 100000 रुपये
(2) ‡द्वतीय प्ररस्कार - 75000 रुपये
(3) तृतीय पुरस्कार - 50000 रुपये
(4) 10 सांत्वना पुरस्कार - 100000 रुपये
2.9.2003
डॉ. सीता कान्त महापात्र की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया जो संविधान की आठवीं अनुसूची में अन्य भाषाओं को सम्मिलित किए जाने तथा आठवीं अनुसूची में सभी भाषाओं को संघ की राजभाषा घोषित किए जाने की साध्यता परखने पर विचार करेगी । समिति ने 14.6.2004 को अपनी रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की ।
11.9.2003
मंत्रिमंडल ने एन.डी.ए. तथा सी.डी.एस. की परीक्षाओं में प्रश्न पत्रों को हिंदी में भी तैयार करने का निर्णय लिया ।
14.9.2003
कंप्यूटर की सहायता से प्रबोध, प्रवीण तथा प्राज्ञ स्तर की हिंदी स्वयं सीखने के लिए राजभाषा विभाग ने कंप्यूटर प्रोग्राम (लीला हिंदी प्रबोध, लीला हिंदी प्रवीण, लीला हिंदी प्राज्ञ ) तैयार करवा कर सर्व साधारण द्वारा उसका निशुल्क प्रयोग के लिए उसे राजभाषा विभाग की वैब साइट पर उपलब्ध करा दिया है।
8.1.2004
बोडो, डोगरी, मैथिली तथा सांथाली भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा ।
22.7.2004
केन्द्रीय सरकार की राजभाषा नीति के अनुपालन /कार्यान्वयन के लिए न्यूनतम हिन्दी पदों के मानक पुन निर्धारित ।
6.9.2004
मातृभाषा विकास परिषद् द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने यह पाया कि वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग के गठन का उद्देश्य हिंदी एवं अन्य आधुनिक भाषाओं के लिए तकनीकी शब्दावली में एकरूपता अपनाया जाना है। यह एकरूपता तकनीकी शब्दावली के प्रयोग के लिए आवश्यक है । उच्चतम न्यायालय ने निदेश दिया कि आयोग द्वारा बनाई गई तकनीकी शब्दावली भारत सरकार के अंतर्गत एन.सी.ई.आर.टी तथा इसी प्रकार की अन्य संस्थाओं द्वारा तैयार की जा रही पाठय पुस्तकों में प्रयोग में लाई जाए ।
14.9.2004
कंप्यूटर की सहायता से तमिल, तेलुगू, मलयालम तथा कन्नड़ भाषाओं के माध्यम से प्रबोध, प्रवीण तथा प्राज्ञ स्तर की हिंदी स्वयं सीखने के लिए कंप्यूटर प्रोग्राम तैयार करवा कर उसके निशुल्क प्रयोग के लिए उसे राजभाषा विभाग की वैब साइट पर उपलब्ध करा दिया ।
20.6.2005
525 हिंदी फोंट, फोंट कोड कनवर्टर, अंग्रेजी - हिंदी शब्दकोश, हिंदी स्पेल चेकर को निशुल्क प्रयोग के ‡लए वेब साइट पर उपलब्ध करा दिया गया । इन्हें http://ildc.in <http://ildc.gov.in/> से डाउनलोड किया जा सकता है ।
8.8.2005
राष्ट्रीय ज्ञान-‡वज्ञान मौ‡लक पुस्तक लेखन पुरस्कार का नाम बदल कर राजीव गांधी राष्ट्रीय ज्ञान-विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार कर दिया गया तथा पुरस्कार राशि बढ़ा कर निम्न प्रकार कर दी गई :-
प्रथम पुरस्कार - रू० 2 लाख
द्वितीय पुरस्कार - रू० 1.25 लाख
तृतीय पुरस्कार - रू० 0.75 लाख
सांत्वना पुरस्कार (10) - रू० 10 हजार प्रत्येक को
यह योजना वर्ष 2004-95 में प्रकाशित पुस्तकों से लागू होगी ।
14.9.2005
कंप्यूटर की सहायता से बांगला भाषा के माध्यम से प्रबोध, प्रवीण तथा प्राज्ञ स्तर की हिंदी स्वयं सीखने के लिए प्रोग्राम तैयार करवा कर राजभाषा विभाग की वैब साइट पर उपलब्ध करा दिया गया ।
मंत्र-राजभाषा अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद सॉफ्टवेयर प्रशासनिक एवं वित्तिय क्षेत्रों के लिए प्रयोग एवं डाउनलोड हेतु राजभाषा विभाग की वैब साइट पर उपलब्ध करा दिया ।
14.9.2006
कंप्यूटर की सहायता से उड़िया, असमी, मणिपुरी तथा मराठी भाषा के माध्यम से प्रबोध, प्रवीण तथा प्राज्ञ स्तर की हिंदी स्वयं सीखने के लिए प्रोग्राम तैयार करवा कर राजभाषा विभाग की वैब साइट पर उपलब्ध करा दिया ।
मंत्र-राजभाषा अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद सॉफ्टवेयर लघु उद्योग एवं कृषि क्षेत्रों के लिए प्रयोग एवं डाउनलोड हेतु राजभाषा विभाग की वैब साइट पर उपलब्ध करा दिया ।
14.9.2007
कंप्यूटर की सहायता से नेपाली, पंजाबी, कश्मीरी तथा गुजराती भाषा के माध्यम से प्रबोध, प्रवीण तथा प्राज्ञ स्तर की हिंदी स्वयं सीखने के लिए प्रोग्राम तैयार करवा कर राजभाषा विभाग की वैब साइट पर उपलब्ध करा दिया ।
मंत्र-राजभाषा अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद सॉफ्टवेयर सूचना-प्रौद्योगिकी एवं स्वास्थ्य सुरक्षा क्षेत्रों के लिए प्रयोग एवं डाउनलोड हेतु राजभाषा विभाग की वैब साइट पर उपलब्ध करा दिया ।
श्रुतलेखन-राजभाषा (हिंदी स्पीच से हिंदी टेक्सट) अंतिम वर्जन जन-प्रयोग के लिए मार्किट में बिक्री के लिए उपलब्ध है ।
(विकीपीडिया से साभार)

बुधवार, अगस्त 31, 2011

"ईद मुबारक-फोटो फीचर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

विगत 30 वर्षों से मैं ईद के मुबारक मौके पर 
अपने शहर की ज़ामा मस्जिद में 
अपने मुसलमान भाइयों को 
मुबारकवाद देने के लिए जाता रहा हूँ। 
इस साल भी जैसे ही मेरी घड़ी ने सुबह के 10 बजाए 
मैं जामा मस्जिद पहुँच गया।
यहाँ पर कानून व्यवस्था के मद्देनजर 
पुलिस का भी भारी इन्तजाम था।
सबसे पहले में अपने मित्रों से मिला। 
जिसमें मेरी पार्टी के लोग, 
खटीमा शहर के परगना मजिस्ट्रेट, 
पुलिस क्षेत्राधिकारी, शहर कोतवाल आदि थे।
इनमें वो भी तमाम लोग थे 
जो उत्तराखण्ड में 2012 के विधानसभा चुनाव में
अपने को सम्भावित प्रत्याशी के रूप में अपने को देख रहे हैं।
इस मौके पर खटीमा की ज़ामा मस्ज़िद में 
काफी चहल-पहल थी।
ईद की नमाज़ के लिए लोगों की ज़मात लगी थी।
लोग अपनी इबादत में देश में अमन-ओ-अमान की दुआ कर रहे थे।
मस्जिद के भीतर जगह कम पड़ जाने के कारण 
उसके बाहर बने प्रांगण मे भी जमात के लिए 
नमाज़ अता करने के लिए
टेंट लगाया गया था। 
यहाँ भी नमाज पढ़ने वालों का काफी हुज़ूम था।
जैसे ही नमाज अता हुई लोगों का 
मस्ज़िद से बाहर निकलने का सिलसिला शुरू हो गया।
इस मौके पर लोग खैरात करते हुए भी देखे गये।
मैं भी अपने मित्रों के साथ अपने मुसलमान भाइयों को 
मुबारकवाद देने की इन्तजार में खड़ा था।
अब गले मिलने का सिलसिला शुरू हो गया था।
इस मौके पर बहुजन समाज पार्टी के सम्भावित प्रत्याशी
डॉ. जी.सी.पाण्डेय भी मौजूद थे।
खटीमा के वर्तमान विधायक माननीय गोपाल सिंह राणा भी
लोगों को बधाइयाँ दे रहे थे
ईद के इस मेले में काफी लोग खरीदारी भी कर रहे थे।

रविवार, अगस्त 21, 2011

"यह मेरे लिए कितना उपयोगी होगा?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मेरे बहुत से मित्र सोच रहे होंगे कि 
मैं कल 20 अगस्त को नेट पर ज्यादा देर तक क्यों नहीं रहा?
इसका कारण यह है कि कल मैं दोपहर को बरेली चला गया था।
वहाँ से मैंने
एसर कम्पनी का
एस्पायर-वन हैप्पी मिनी-लैपटॉप खरीदा 
और रात को 10 बजे घर वापिस आ गया।
इसलिए किसी भी ब्लॉग पर टिप्पणी भी करने नहीं जा पाया।
क्योंकि 200 किमी कार चला कर
घर पहुँचते-पहुँचते मैं बहुत थक गया था!
इसका विवरण है!
OS: WINDOW 7 STARTER 32-BIT SP-1 (Genune)
Processor: Intel* Atum* N570
Memory: 1G B DDR3
STORAGE:320 GB HDD*
Card Reader: Multi-in-1 Reader
WALAN: N A
BLUETOOTH: BLUETOOTH*3.0+HS
WEBCAM_ Built-in Webcam
Battery: 6-Cell LI Ion Battery
बैटरी बैकप-8 घण्टे
स्क्रीन साइज-10.1-inch, 1024x600 display
Software: Microsoft* Office 2010 Preloaded
कीमत-रु. 18,500/- (बरेली, उ.प्र. में)

जो ब्लॉगर मित्र इसके जानकार हों! 
कृपया टिप्पणी में बताएँ कि-
यह मेरे लिए कितना उपयोगी होगा?

"यह मेरे लिए कितना उपयोगी होगा?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मेरे बहुत से मित्र सोच रहे होंगे कि 
मैं कल 20 अगस्त को नेट पर ज्यादा देर तक क्यों नहीं रहा?
इसका कारम यह है कि कल मैं दोपहर को बरेली चला गया था।
वहाँ से मैंने
एसर कम्पनी का
एस्पायर-वन हैप्पी मिनी-लैपटॉप खरीदा 
और रात को 10 बजे घर वापिस आ गया।
इसलिए किसी भी ब्लॉग पर टिप्पणी भी करने नहीं जा पाया।
क्योंकि 200 किमी कार चला कर
घर पहुँचते-पहुँचते मैं बहुत थक गया था!
इसका विवरण है!
OS: WINDOW 7 STARTER 32-BIT SP-1 (Genune)
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कृपया टिप्पणी में बताएँ कि-
यह मेरे लिए कितना उपयोगी होगा?

रविवार, जुलाई 31, 2011

"उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द के जन्म-दिवस पर विशेष"


मुंशी प्रेमचन्द का जीवन परिचय 
(Premchand's Biography)
जन्म-
प्रेमचन्द का जन्म ३१ जुलाई सन् १८८० को बनारस शहर से चार मील दूर लमही गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम अजायब राय था। वह डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे।जीवन धनपतराय की उम्र जब केवल आठ साल की थी तो माता के स्वर्गवास हो जाने के बाद से अपने जीवन के अन्त तक लगातार विषम परिस्थितियों का सामना धनपतराय को करना पड़ा। पिताजी ने दूसरी शादी कर ली जिसके कारण बालक प्रेम व स्नेह को चाहते हुए भी ना पा सका। आपका जीवन गरीबी में ही पला। कहा जाता है कि आपके घर में भयंकर गरीबी थी। पहनने के लिए कपड़े न होते थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता था। इन सबके अलावा घर में सौतेली माँ का व्यवहार भी हालत को खस्ता करने वाला था।
शादी-
आपके पिता ने केवल १५ साल की आयू में आपका विवाह करा दिया। पत्नी उम्र में आपसे बड़ी और बदसूरत थी। पत्नी की सूरत और उसके जबान ने आपके जले पर नमक का काम किया। आप स्वयं लिखते हैं, "उम्र में वह मुझसे ज्यादा थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया।......." उसके साथ - साथ जबान की भी मीठी न थी। आपने अपनी शादी के फैसले पर पिता के बारे में लिखा है "पिताजी ने जीवन के अन्तिम सालों में एक ठोकर खाई और स्वयं तो गिरे ही, साथ में मुझे भी डुबो दिया: मेरी शादी बिना सोंचे समझे कर डाली।" हालांकि आपके पिताजी को भी बाद में इसका एहसास हुआ और काफी अफसोस किया।विवाह के एक साल बाद ही पिताजी का देहान्त हो गया। अचानक आपके सिर पर पूरे घर का बोझ आ गया। एक साथ पाँच लोगों का खर्चा सहन करना पड़ा। पाँच लोगों में विमाता, उसके दो बच्चे पत्नी और स्वयं। प्रेमचन्द की आर्थिक विपत्तियों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट बेचना पड़ा और पुस्तकें बेचनी पड़ी। एक दिन ऐसी हालत हो गई कि वे अपनी सारी पुस्तकों को लेकर एक बुकसेलर के पास पहुंच गए। वहाँ एक हेडमास्टर मिले जिन्होंने आपको अपने स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त किया।
शिक्षा-
अपनी गरीबी से लड़ते हुए प्रेमचन्द ने अपनी पढ़ाई मैट्रिक तक पहुंचाई। जीवन के आरंभ में आप अपने गाँव से दूर बनारस पढ़ने के लिए नंगे पाँव जाया करते थे। इसी बीच पिता का देहान्त हो गया। पढ़ने का शौक था, आगे चलकर वकील बनना चाहते थे। मगर गरीबी ने तोड़ दिया। स्कूल आने - जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहाँ ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर एक कमरा लेकर रहने लगे। ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था। पाँच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को और दो रुपये से अपनी जिन्दगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे। इस दो रुपये से क्या होता महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे। इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में मैट्रिक पास किया।साहित्यिक रुचिगरीबी, अभाव, शोषण तथा उत्पीड़न जैसी जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी प्रेमचन्द के साहित्य की ओर उनके झुकाव को रोक न सकी। प्रेमचन्द जब मिडिल में थे तभी से आपने उपन्यास पढ़ना आरंभ कर दिया था। आपको बचपन से ही उर्दू आती थी। आप पर नॉवल और उर्दू उपन्यास का ऐसा उन्माद छाया कि आप बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही सब नॉवल पढ़ गए। आपने दो - तीन साल के अन्दर ही सैकड़ों नॉवेलों को पढ़ डाला। आपने बचपन में ही उर्दू के समकालीन उपन्यासकार सरुर मोलमा शार, रतन नाथ सरशार आदि के दीवाने हो गये कि जहाँ भी इनकी किताब मिलती उसे पढ़ने का हर संभव प्रयास करते थे। आपकी रुचि इस बात से साफ झलकती है कि एक किताब को पढ़ने के लिए आपने एक तम्बाकू वाले से दोस्ती करली और उसकी दुकान पर मौजूद "तिलस्मे - होशरुबा" पढ़ डाली।अंग्रेजी के अपने जमाने के मशहूर उपन्यासकार रोनाल्ड की किताबों के उर्दू तरजुमो को आपने काफी कम उम्र में ही पढ़ लिया था। इतनी बड़ी - बड़ी किताबों और उपन्यासकारों को पढ़ने के बावजूद प्रेमचन्द ने अपने मार्ग को अपने व्यक्तिगत विषम जीवन अनुभव तक ही महदूद रखा।तेरह वर्ष की उम्र में से ही प्रेमचन्द ने लिखना आरंभ कर दिया था। शुरु में आपने कुछ नाटक लिखे फिर बाद में उर्दू में उपन्यास लिखना आरंभ किया। इस तरह आपका साहित्यिक सफर शुरु हुआ जो मरते दम तक साथ - साथ रहा।प्रेमचन्द की दूसरी शादीसन् १९०५ में आपकी पहली पत्नी पारिवारिक कटुताओं के कारण घर छोड़कर मायके चली गई फिर वह कभी नहीं आई। विच्छेद के बावजूद कुछ सालों तक वह अपनी पहली पत्नी को खर्चा भेजते रहे। सन् १९०५ के अन्तिम दिनों में आपने शीवरानी देवी से शादी कर ली। शीवरानी देवी एक विधवा थी और विधवा के प्रति आप सदा स्नेह के पात्र रहे थे।यह कहा जा सकता है कि दूसरी शादी के पश्चात् आपके जीवन में परिस्थितियां कुछ बदली और आय की आर्थिक तंगी कम हुई। आपके लेखन में अधिक सजगता आई। आपकी पदोन्नति हुई तथा आप स्कूलों के डिप्टी इन्सपेक्टर बना दिये गए। इसी खुशहाली के जमाने में आपकी पाँच कहानियों का संग्रह सोजे वतन प्रकाश में आया। यह संग्रह काफी मशहूर हुआ।
व्यक्तित्व-
सादा एवं सरल जीवन के मालिक प्रेमचन्द सदा मस्त रहते थे। उनके जीवन में विषमताओं और कटुताओं से वह लगातार खेलते रहे। इस खेल को उन्होंने बाजी मान लिया जिसको हमेशा जीतना चाहते थे। अपने जीवन की परेशानियों को लेकर उन्होंने एक बार मुंशी दयानारायण निगम को एक पत्र में लिखा "हमारा काम तो केवल खेलना है- खूब दिल लगाकर खेलना- खूब जी- तोड़ खेलना, अपने को हार से इस तरह बचाना मानों हम दोनों लोकों की संपत्ति खो बैठेंगे। किन्तु हारने के पश्चात् - पटखनी खाने के बाद, धूल झाड़ खड़े हो जाना चाहिए और फिर ताल ठोंक कर विरोधी से कहना चाहिए कि एक बार फिर जैसा कि सूरदास कह गए हैं, "तुम जीते हम हारे। पर फिर लड़ेंगे।" कहा जाता है कि प्रेमचन्द हंसोड़ प्रकृति के मालिक थे। विषमताओं भरे जीवन में हंसोड़ होना एक बहादुर का काम है। इससे इस बात को भी समझा जा सकता है कि वह अपूर्व जीवनी-शक्ति का द्योतक थे। सरलता, सौजन्यता और उदारता के वह मूर्ति थे।जहां उनके हृदय में मित्रों के लिए उदार भाव था वहीं उनके हृदय में गरीबों एवं पीड़ितों के लिए सहानुभूति का अथाह सागर था। जैसा कि उनकी पत्नी कहती हैं "कि जाड़े के दिनों में चालीस - चालीस रुपये दो बार दिए गए दोनों बार उन्होंने वह रुपये प्रेस के मजदूरों को दे दिये। मेरे नाराज होने पर उन्होंने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि हमारे प्रेस में काम करने वाले मजदूर भूखे हों और हम गरम सूट पहनें।"प्रेमचन्द उच्चकोटि के मानव थे। आपको गाँव जीवन से अच्छा प्रेम था। वह सदा साधारण गंवई लिबास में रहते थे। जीवन का अधिकांश भाग उन्होंने गाँव में ही गुजारा। बाहर से बिल्कुल साधारण दिखने वाले प्रेमचन्द अन्दर से जीवनी-शक्ति के मालिक थे। अन्दर से जरा सा भी किसी ने देखा तो उसे प्रभावित होना ही था। वह आडम्बर एवं दिखावा से मीलों दूर रहते थे। जीवन में न तो उनको विलास मिला और न ही उनको इसकी तमन्ना थी। तमाम महापुरुषों की तरह अपना काम स्वयं करना पसंद करते थे।ईश्वर के प्रति आस्थाजीवन के प्रति उनकी अगाढ़ आस्था थी लेकिन जीवन की विषमताओं के कारण वह कभी भी ईश्वर के बारे में आस्थावादी नहीं बन सके। धीरे - धीरे वे अनीश्वरवादी से बन गए थे। एक बार उन्होंने जैनेन्दजी को लिखा "तुम आस्तिकता की ओर बढ़े जा रहे हो - जा रहीं रहे पक्के भग्त बनते जा रहे हो। मैं संदेह से पक्का नास्तिक बनता जा रहा हूँ।"मृत्यू के कुछ घंटे पहले भी उन्होंने जैनेन्द्रजी से कहा था - "जैनेन्द्र, लोग ऐसे समय में ईश्वर को याद करते हैं मुझे भी याद दिलाई जाती है। पर मुझे अभी तक ईश्वर को कष्ट देने की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।"प्रेमचन्द की कृतियाँप्रेमचन्द ने अपने नाते के मामू के एक विशेष प्रसंग को लेकर अपनी सबसे पहली रचना लिखी। १३ साल की आयु में इस रचना के पूरा होते ही प्रेमचन्द साकहत्यकार की पंक्ति में खड़े हो गए। सन् १८९४ ई० में "होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात" नामक नाटक की रचना की। सन् १८९८ में एक उपन्यास लिखा। लगभग इसी समय "रुठी रानी" नामक दूसरा उपन्यास जिसका विषय इतिहास था की रचना की। सन १९०२ में प्रेमा और सन् १९०४-०५ में "हम खुर्मा व हम सवाब" नामक उपन्यास लिखे गए। इन उपन्यासों में विधवा-जीवन और विधवा-समस्या का चित्रण प्रेमचन्द ने काफी अच्छे ढंग से किया। जब कुछ आर्थिक निर्जिंश्चतता आई तो १९०७ में पाँच कहानियों का संग्रह सोड़ो वतन (वतन का दुख दर्द) की रचना की। जैसा कि इसके नाम से ही मालूम होता है, इसमें देश प्रेम और देश को जनता के दर्द को रचनाकार ने प्रस्तुत किया। अंग्रेज शासकों को इस संग्रह से बगावत की झलक मालूम हुई। इस समय प्रेमचन्द नायाबराय के नाम से लिखा करते थे। लिहाजा नायाब राय की खोज शुरु हुई। नायाबराय पकड़ लिये गए और शासक के सामने बुलाया गया। उस दिन आपके सामने ही आपकी इस कृति को अंग्रेजी शासकों ने जला दिया और बिना आज्ञा न लिखने का बंधन लगा दिया गया।इस बंधन से बचने के लिए प्रेमचन्द ने दयानारायण निगम को पत्र लिखा और उनको बताया कि वह अब कभी नयाबराय या धनपतराय के नाम से नहीं लिखेंगे तो मुंशी दयानारायण निगम ने पहली बार प्रेमचन्द नाम सुझाया। यहीं से धनपतराय हमेशा के लिए प्रेमचन्द हो गये।"सेवा सदन", "मिल मजदूर" तथा १९३५ में गोदान की रचना की। गोदान आपकी समस्त रचनाओं में सबसे ज्यादा मशहूर हुई अपनी जिन्दगी के आखिरी सफर में मंगलसूत्र नामक अंतिम उपन्यास लिखना आरंभ किया। दुर्भाग्यवश मंगलसूत्र को अधूरा ही छोड़ गये। इससे पहले उन्होंने महाजनी और पूँजीवादी युग प्रवृत्ति की निन्दा करते हुए "महाजनी सभ्यता" नाम से एक लेख भी लिखा था।
मृत्यु-
सन् १९३६ ई० में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। अपने इस बीमार काल में ही आपने "प्रगतिशील लेखक संघ" की स्थापना में सहयोग दिया। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण ८ अक्टूबर १९३६ में आपका देहान्त हो गया। और इस तरह वह दीप सदा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण-कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया।
(भारत दर्शन से साभार)

बुधवार, जुलाई 20, 2011

"बिन झोली के फकीर-2" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मेरी प्यारी जूली
गतांक से आगे....

          कालान्तर में जूली ने 4 छोटे-छोटे पिल्लों को जन्म दिया। जिसमें से एक तो जन्म के बाद ही चल बसा। एक पेयर मेरे मित्र डॉ. दत्ता ने ले लिया और एक पिल्ला हमने अपने पास रख लिया। प्यार से उसका नाम पिल्लू रखा गया। यह हल्के ब्राउन रंग का था। जूली की तरह इसके बड़े बाल नहीं थे। इसको अधिक कुछ हमें सिखान भी नहीं पड़ा। क्योंकि यह अपनी माँ को देख-देखकर खुद ही काफी कुछ सीख गया था।
     घर वालों को यह ज्यादा अच्छा नहीं लगता था क्योंकि यह अपनी माँ की तरह बड़े बालों वाला नहीं था। मेरी माता जी तो इसे बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थीं और इसे कूड़ा चुगने वाला कुत्ता बतातीं थीं!
एक दिन एक मनीहार चूड़ी पहनाने के लिए बनबसा आया तो माता जी ने कहा कि भैया इस कुत्ते को अपने घर ले जा। मनीहार ने कहा कि माता जी इसको चेन मे बाँधकर मुझे दे दो।
माता जी ने पिल्लू को चेन में बाँधकर मनीहार के हाथ में चेन थमा दी। जब तक माता जी पिल्लू को दिखाई देती रहीं तब तक तो पिल्लू कुछ नही बोला मगर जैसे ही मनीहार इसे लेकर चला तो पिल्लू ने उसे 2-3 जगह काट लिया। जैसे-तैसे वह पिल्लू की चेन छोड़कर चलता बना।
     जब पिल्लू 6 महीने का हा तो इसकी माँ जूली को जलोदर रोग हो गया और वह 2 महीने में चल बसी। कुछ दिनों तक तो पिल्लू बहुत परेशान रहा मगर अब यह पहले से ज्यादा समझदार हो गया था।
     उन दिनों मैंने एक बीघा का प्लॉट खटीमा में ले लिया था और इसको बनाने के ले काम शुरू कर दिया था। पिता जी खटीमा में ही रहने लगे थे। माता जी ने पिल्लू को भी पिता जी के साथ खटीमा भेज दिया था। सुबह एक बार 8 बजे मैं भी बनवसा से खटीमा का चक्कर लगा आता ता और राज-मिस्त्रियों को काम समझा आता था।
     पिल्लू मुझे देखकर बहुत खुश हो जाता था। जिस किसी दिन खटीमा के प्लॉट पर कोई नहीं होता था तो पिल्लू पूरी मुस्तैदी से सारे सामान की देखभाल करता था। सुबह को जब राज मिस्त्री काम पर आते थे तो क्या मजाल थी कि यह प्लॉट में घुस जाएँ। पिल्लू मोटी-मोटी बल्लियों को मुँह में दबा कर बैठ जाता और किसी को हाथ भी नहीं लगाने देता था।
     जब मैं या पिता जी आते थे तो यह सामान्य हो जाता था और राज-मजदूर अपने काम पर लग जाते थे।
     करीब तीन महीने बाद खटीमा में 3 दूकाने और रहने के लिए 3 कमरे तैयार हो गये थे। अतः हम लोग भी बनबसा से खटीमा में ही शिफ्ट हो गये थे। पिल्लू बाहर गेट के पास ही रहता था और हम लोग चैन की नींद सोते थे।
     उन दिनों बाहर का आँगन कच्चा ही था और उसमें ईंटें बिछी हुई थी। अतः गर्मियों में मेरे पिता जी बाहर गन में चारपाई डालकर सोते थे। पिल्लू उनकी चारपाई के नीचे पड़ा रहता था।
     मैं प्रतिदिन सुबह 4 बजे उठकर घूमने के लिए जाता था और पिल्लू मेरे साथ-साथ चल पड़ता था। एक दिन मैं जब उठकर घूमने के लिए जा रहा था तो देखा कि कि पिता जी की चारपाई से कुछ दूर एक साँप लहूलुहान मरा पड़ा था तो मुझे यह समझते हुए देर न लगी कि पिल्लू ने ही यह सब किया होगा।
     इस वफादार ने अपनी जान की परवाह न करते हुए साँप को मार डाला और मेरे पिता जी रक्षा की।
     ऐसे होते हैं ये बिन झोली के फकीर।
     मालिक के वफादार और सच्चे चौकीदार।।
क्रमशः..........

कृपया नापतोल.कॉम से कोई सामन न खरीदें।

मैंने Napptol.com को Order number- 5642977
order date- 23-12-1012 को xelectron resistive SIM calling tablet WS777 का आर्डर किया था। जिसकी डिलीवरी मुझे Delivery date- 11-01-2013 को प्राप्त हुई। इस टैब-पी.सी में मुझे निम्न कमियाँ मिली-
1- Camera is not working.
2- U-Tube is not working.
3- Skype is not working.
4- Google Map is not working.
5- Navigation is not working.
6- in this product found only one camera. Back side camera is not in this product. but product advertisement says this product has 2 cameras.
7- Wi-Fi singals quality is very poor.
8- The battery charger of this product (xelectron resistive SIM calling tablet WS777) has stopped work dated 12-01-2013 3p.m. 9- So this product is useless to me.
10- Napptol.com cheating me.
विनीत जी!!
आपने मेरी शिकायत पर करोई ध्यान नहीं दिया!
नापतोल के विश्वास पर मैंने यह टैबलेट पी.सी. आपके चैनल से खरीदा था!
मैंने इस पर एक आलेख अपने ब्लॉग "धरा के रंग" पर लगाया था!

"नापतोलडॉटकॉम से कोई सामान न खरीदें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जिस पर मुझे कई कमेंट मिले हैं, जिनमें से एक यह भी है-
Sriprakash Dimri – (January 22, 2013 at 5:39 PM)

शास्त्री जी हमने भी धर्मपत्नी जी के चेतावनी देने के बाद भी
नापतोल डाट काम से कार के लिए वैक्यूम क्लीनर ऑनलाइन शापिंग से खरीदा ...
जो की कभी भी नहीं चला ....ईमेल से इनके फोरम में शिकायत करना के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला ..
.हंसी का पात्र बना ..अर्थ हानि के बाद भी आधुनिक नहीं आलसी कहलाया .....
--
मान्यवर,
मैंने आपको चेतावनी दी थी कि यदि आप 15 दिनों के भीतर मेरा प्रोड्कट नहीं बदलेंगे तो मैं
अपने सभी 21 ब्लॉग्स पर आपका पर्दाफास करूँगा।
यह अवधि 26 जनवरी 2013 को समाप्त हो रही है।
अतः 27 जनवरी को मैं अपने सभी ब्लॉगों और अपनी फेसबुक, ट्वीटर, यू-ट्यूब, ऑरकुट पर
आपके घटिया समान बेचने
और भारत की भोली-भाली जनता को ठगने का विज्ञापन प्रकाशित करूँगा।
जिसके जिम्मेदार आप स्वयं होंगे।
इत्तला जानें।