समर्थक

शुक्रवार, जुलाई 31, 2009

मुंशी प्रेमचन्द के जन्म दिवस पर गोष्ठी सम्पन्न।

आज 31 जुलाई को
उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द का 130वाँ जन्म दिन है।

इस अवसर पर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, खटीमा के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. सिद्धेश्वर सिंह के निवास पर इस उपलक्ष्य में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता शिक्षाविद् गीताराम बंसल ने की तथा संचालन राजकीय इण्टर कालेज के प्रवक्ता डॉ. गंगाधर राय ने किया।


इस अवसर पर सबसे पहले जाने माने ब्लॉगर डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ने सरस्वती वन्दना का पाठ किया ।


इसके बाद डॉ. सिद्धेश्वर सिंह ने मुंशी प्रेमचन्द के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तृत प्रकाश डाला।


अनेक पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके राज किशोर सक्सेना राज ने अपनी सशक्त कविता के माध्यम से उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द को श्रद्धांजलि समर्पित की।

‘‘है अतुल तुम्हारा योगदान, भाषा का रूप सँवारा है।

हे गद्य विघा के प्रेमचन्द्र तुमको शत् नमन हमारा है।।’’


इस अवसर पर रूमानी शायर गुरू सहाय भटनागर ‘बदनाम’ न मुंशी प्रेमचन्द को याद करते हुए अपनी रूमानी कविता का वाचन किया।
संचालन कर रहे डॉ. गंगाधर राय ने उपन्यास सम्राट की कई कहानियों की चर्चा करते हुए गोष्ठी को जीवन्तता प्रदान की।
गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में पधारे उद्योगपति पी0एन0सक्सेना ने मुंशी प्रेमचन्द केे साहित्य इस युग में भी प्रासंगिक बताते हुए इस चर्चा को सार्थक बताया।
अन्त में अध्यक्ष पद से बोलते हुए शिक्षाविद् गीताराम बंसल ने मुंशी जी को साहित्य का युगपुरुष बताते हुए गोष्ठी का समापन किया।

गुरुवार, जुलाई 30, 2009

‘‘चीनी सन्त का अन्तिम उपदेश’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


चीनी सन्त कन्फ्यूसियस मृत्यु-शैया पर पड़े थे। एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया और एक-एक करके अपने पास आने को कहा।
वह प्रत्येक शिष्य को अपना मुँह खोलकर दिखाते और पूछते-‘‘देखो मुँह में दाँत हैं?’’
प्रत्येक शिष्य देखता गया और ‘‘नही’’ में उत्तर देता गया।
सन्त कन्फ्यूसियस ने पुनः सब शिष्यों को बुलाया और अपना मुँह खोलकर पुनः प्रश्न किया- ‘‘क्या मुँह में मेरी जीभ है?’’ सब शिष्यों ने एक साथ उत्तर दिया- ‘‘हाँ! जीभ तो है।’’
अब सन्त ने शिष्यों से कहा- ‘‘प्रिय शिष्यों, देखो! दाँत मुझे भगवान ने बाद में दिये थे और जिह्वा जन्म से ही मेरे साथ आई थी। आज मैं जा रहा हूँ। दाँत मुझे वर्षों पूर्व छोड़ कर चले गये और जिह्वा आज भी मेरे साथ है।
’’सन्त ने पुनः कहा- ‘‘दाँत अपनी कठोरता के कारण पहले ही चले गये और जीभ अपनी कोमलता के कारण आजीवन साथ रही। तुम लोग भी कोमल और मधुर स्वभाव को बनाये रखना। यही मेरा अन्तिम उपदेश है।’’

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

शनिवार, जुलाई 25, 2009

"मेरी पौत्री का जन्म-दिन"

"मेरी पौत्री प्राची का जन्म-दिन"
आप भी इस अवसर पर
ये मजेदार वीडियो-क्लिप देखें और गाने का आनन्द लें।

video
अगर पसन्द आये तो प्रतिक्रिया भी दें।

गुरुवार, जुलाई 23, 2009

‘‘साबरमती आश्रम, अहमदाबाद’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)




आठ अक्टूबर 2008 को मेरा किसी समारोह में जाने का कार्यक्रम पहले से ही निश्चित था। समारोह/सम्मेलन दो दिन तक चला।



यूँ तो अहमदाबाद के कई दर्शनीय स्थलो का भ्रमण किया, परन्तु मुझे गांधी जी का साबरमती आश्रम देख कर बहुत अच्छा लगा।



10 अक्टूबर को मैं अपने कई साथियों के साथ। प्रातः 9 बजे आश्रम में पहुँचा। चार-पाँच घण्टे आश्रम मे ही गुजारे।


उसी समय की खपरेल से आच्छादित गांधी जी का आवास भी देखा। वही सूत कातने का अम्बर चरखा। उसके पीछे महात्मा जी का आसन। एक पल को तो ऐसा लगा जैसे कि गांधी जी अभी इस आसन पर बैठने के लिए आने वाले हों।


अन्दर गया तो एक अल्मारी में करीने से रखे हुए थे गान्धी जी के किचन के कुछ बर्तन।


छोटी हबेलीनुमा इस भवन में माता कस्तूरबा का कमरा भी देखा जिसके बाहर उनकी फोटो आज भी लगी हुई है।


इसके बगल में ही अतिथियों के लिए भी एक कमरा बना है।


इसके बाद बाहर निकले तो विनोबा जी की कुटी दिखाई पड़ी। इसे भी आज तक मूल रूप में ही सँवारा हुआ है।



आश्रम के पहले गेट के साथ ही गुजरात हरितन सेवक संघ का कार्यालय आज भी विराजमान है।



आश्रम के साथ ही साबर नदी की धारा भी बहती दिखाई दी। लेकिन प्रदूषण के मारे उसका भी बुरा हाल देखा।



कुल मिला कर यह लगा कि आश्रम में आने पर आज भी शान्ति मिलती है।

सच पूछा जाये तो अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे बने आश्रम में आज भी मोहनदास कर्मचन्द गांधी की आत्मा बसती है।

शनिवार, जुलाई 18, 2009

‘‘चम्पावत जिले की सुरम्य वादियाँ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


अगर कभी आपका कार्यक्रम उत्तराखण्ड में कुमाऊँ में घूमने का बन जाता है तो दिल्ली से 350 किमी मुरादाबाद से 185 किमी की दूरी पर नेपाल सीमा पर बसा टनकपुर शहर है। इसे पहाड़ों का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।

(चित्र माता श्री पूर्णागिरि दरबार, चम्गावत-उत्तराखण्ड)

सिद्ध-पीठ के रूप में मानी जाने वाली माता पूर्णागिरि के रास्ते में टनकपुर से 14 किमी दूर शारदा नदी के किनारे घने जंगलों के बीच एक स्थान बूम के नाम से जाना जाता है।

इसके प्राकृतिक नजारे तो आपको अपनी ओर आकर्षित करेंगे ही साथ ही यहाँ बंगाली शैली का माता माधवी का मन्दिर भी आपका मन जरूर मोह लेगा।

माता माधवी के मन्दिर के साथ ही यहाँ उत्तराखण्ड पर्यटन विभाग ने एक छोटा सा गेस्ट हाउस भी बना दिया है।

आज होली का दिन है। कल रंगों की दुल्हैण्डी होगी। घर में कुछ अतिथि भी आये हुए हैं । अतः आज बूम में पिकनिक मनाने का कार्यक्रम बन ही गया। सबसे पहले हम लोग दो कारों में बैठ कर बूम पहुँचे। शारदा नदी के कल-कल निनाद ने मन ऐसा मोहा कि नदी में स्नान का मूड बन ही गया। एक घण्टे में सब लोग स्नान से निवृत्त हो गये। इसके बाद हम लोग उत्तराखण्ड पर्यटन विभाग द्वारा बनाये गये गस्ट हाउस की टैरेस पर आ गये।

जिस पर विशाल टीन शेड बना हुआ है। पूर्णागिरि मेले के समय में इसमें 100 के लगभग फोल्डिंग चारपाई बिछा दी जाती हैं। कुछ श्रद्धालू यहाँ भी रात्रि विश्राम कर ही लेते हैं। हम लोगों ने यहाँ कुछ देर विश्राम किया और रसोइए को खाना बनाने को कह दिया गया। इसके बाद हम लोग माता माधवी देवी के आश्रम में विशाल मन्दिर को देखने गये।

आप भी देखें। इन सुन्दर दृश्यों को-
मन्दिर में दर्शन के उपरान्त हम लोग पुनः गेस्ट हाउस में आये टैरेस पर ही दरी बिछा कर भोजन किया और पिकनिक पूरी हो गयी।

मंगलवार, जुलाई 14, 2009

‘‘नानक सागर डाम’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



पन्द्रह कि.मी. तक सिर्फ पानी ही पानी। दूर दिखाई दे रही , कुमाऊँ की सुरम्य पर्वतमाला।
आप ऊपर जो चित्र देख रहे हैं। यह किसी समूद्र का चित्र नही है।
यह दृश्य है उत्तराखण्ड की नैनीताल कमिश्नरी के जिला-ऊधमसिंहनगर स्थित नानक सागर डाम का।
यह दिल्ली से 300 किमी की दूरी पर स्थित है।
इसको कुमाऊँ की पहाड़ियों से निकले कई नदी नाले बरसात में पानी से लवरेज कर देते हैं।
लेकिन देवहा नाला इसको भरने में अपनी प्रमुख भूमिका निभाता है। इससे निकले अतिरिक्त पानी से आगे चल कर देवहा नदी बनी है। जो पीलीभीत जिले में अपने विशालरूप के लिए जानी जाती है।
यदि डामों की बात करे तो अधिकांश डाम भूमि में गहराई पर बने होते है। परन्तु यह इकलौता डाम है जो कि भूमि के ऊपर बना है। यह एक उथला डाम हैं जिसे मजबूत बाँध बनाकर निर्मित किया गया है। इसका निर्माण तत्कालीन उत्तर-प्रदेश सरकार ने 1962 में कराया था।
इसके एक किनारे पर नानकमत्ता साहिब है। नानकमत्ता की लगभग 800 एकड़ भूमि का अधिग्रहण सरकार द्वारा कर लिया गया था।
गुरू नानक देव द्वारा जमीन में फावड़ा मार पानी की धारा प्रकट की गयी थी। जिसे बाउली साहब के नाम से पुकारा जाता है। वह भी इस भूमि पर ही है। सरकार ने पुल बनाकर इस स्थान को सुरक्षित बचा लिया था।
आज नानक सागर डाम एक पर्यटन स्थल के रूप में भी जाना जाता है। इसके किनारे बने पार्क सैलानियों का मन मोह लेते हैं।
ऊपर जो पार्क दिखाई दे रहा है। यह नानक सागर डाम के किनारे पर ही स्थित है। हम भी कभी-कभी यहाँ पर पिकनिक मनाने के लिए जाते हैं। पार्क में छतरीनुमा पेड़ आपको गर्मी का आभास नही होने देंगे।
अगर आप कभी नैनीताल घूमने आयें तो नानकमत्ता अवश्य आयें। गुरूद्वारा में मत्था टिकायें, लंगर छकें और आसपास के अजूबों को भी अपने कैमरे में कैद करके पिकनिक का भरपूर आनन्द उठायें।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)


शनिवार, जुलाई 11, 2009

‘‘गुरूद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)



आज श्री नानकमत्ता साहिब की दूसरी कड़ी प्रस्तुत कर रहा हूँ।

नानकमत्ता में गुरू नानक देव जी की सिद्धों से बहुत ठन चुकी थी। क्योंकि गुरू नानक देव जी अपने सेवादारों के साथ यहाँ आये हुए थे और गुरू गोरखनाथ के शिष्यों को यह गवारा नही था।
सिद्धों ने अपने योग बल से यहाँ का पानी सुखा दिया था। जब बाला मरदाना को प्यास लगी तो पीने को पानी नही था। तब गुरू नानक देव ने फावड़ा मार कर फावड़ी गंगा की धारा प्रकट की। वो स्थान आज भी मौजूद है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा यहाँ नानक सागर डाम बनवा दिया है।
इसलिए यह स्थान डाम के अन्दर आ गया है परन्तु डाम पर पुल बनवा कर इस स्थान को दर्शनीय स्थान के रूप में सुरक्षित किया गया है। इसे आज बाउली साहब क रूप में जाना जाता है।
एक दिन गुरू नानक देव जी क सेवादारों ने गुरू जी से निवेदन किया कि गुरू जी दूध का स्वाद बहुत दिनों से नही चखा है। आज दूध पहने की इच्छा हो रही है तो गरू जी ने एक कुएँ खुदवाया। इस कुएँ में से दूध की धारा फूट निकली।
(गुरूद्वारा के साथ लगा छोटा गुम्बद दूध वाला कुआँ है)
यह स्थान आज भी दूधवाले कुएँ के नाम से जाना जाता है। इस कुएँ के जल में से आज भी कच्चे दूध की महक आती है। दूर-दूर से लोग इसका जल भर कर अपने घरों को ले जाते हैं। गंगा जल के समान ही इस जल को पवित्र माना जाता है। कहा जाता है कि इस जल का पान करने से बहुत सी असाध्य बीमारियों से मुक्ति मिलती है। इसके साथ लगे गुरूद्वारे में अमृत भी छकाया जाता है।

शुक्रवार, जुलाई 10, 2009

‘‘नहले पे दहला या दहले पे नहला’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


लगभग 10 साल पुरानी बात है। उन दिनों चावल का रेट सस्ता ही था। पर इतना भी नही कि हर आदमी बासमती चावल खा सके। इसलिए लोग शरबती अर्थात बिना खुशबू वाली बासमती चावल ही अक्सर खाते थे।

अब तो उसमें भी पीआर-14 की मिलावट होने लगी है। शुद्ध शरबती बासमती का रेट उन दिनों 16 रु0 प्रति किलो चल रहे थे जबकि पीआर-14 कर रेट 7 रु0 प्रति किलो ही था।
रंग-रूप में दोनों किस्म के चावल एक जैसे ही लगते हैं परन्तु पकने के बाद शरबती लम्बा, बारीक और मुलायम हो जाता है और पीआर-14 मोटा और कठोर हो जाता है।
उन्ही दिनों दो फारमर टाइप के व्यापारी एक मिनी ट्रक में रामपुर जिले से चावल भर कर लाये। अच्छे-अच्छे घरों में उन्होंने 200-200 ग्राम के लगभग चावल पकाने के लिए दिये। चावल बेहतरीन थे। अतः हाथों-हाथ उनके चावल बिक गये।
मैंने भी 50 किलो चावल उनसे 15 रु0 के रेट में ले लिए। अगले दिन वो चावल पकाये गये तो वो मोटे और कठोर हो गये थे। खैर ये चावल रख दिये गये।
ये था नहले पे दहला।
2-3 महीने बाद वही फारमर टाइप के व्यापारी फिर दिखाई दिये।
बानगी के रूप में चावल पकाने के लिए दे ही रहे थे कि इस बार मैंने 100 किलो की पूरी बोरी तुलवा ली।
जब पैसा देने का नम्बर आया तो मैंने उसे डाँटना शुरू किया और उसके खिलाफ धोखाधड़ी की रिपोर्ट करने की धमकी दी।
अब तो वह दोनों लोग माफी माँगने लगे। आखिर कार उन्हे अपना 3 माह पुराना चावल वापिस लेना ही पड़ा और पूरे पैसे देकर चलते बने।
ये था दहले पे नहला।
आज इस घटना को 9-10 साल हो गये हैं। तब से ऐसा कोई व्यापारी खटीमा में चावल बेचता हुआ दिखाई नही दिया है।

गुरुवार, जुलाई 09, 2009

‘‘नानकमत्ता साहिब-एक ऐतिहासिक गुरूद्वारा’’(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

गुरूद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब
उत्तराखण्ड के नैनीताल मण्डल में
जिला-ऊधमसिंहनगर में स्थित है।
यह दिल्ली से मात्र ३०० किमी की दूरी पर स्थित है।
(गुरूद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब बाहर का दृश्य)

सिख पन्थ के प्रथम गुरू ‘‘गुरू नानक देव’’ सिर्फ एक ऐतिहासिक पुरूष ही नही थे। वे सत्य के प्रकाशक और एक समाज सुधारक भी थे।

(गुरूद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब भीतर का दृश्य)
उनके समय में गुरू गोरक्षनाथ के शिष्यों का बोल बाला था। जो अपने चमत्कार जनता को दिखाते रहते थे। उस समय आज का नानकमत्ता ‘‘सिद्ध-मत्ता’’ के नाम से जाना जाता है। इससे लगा गाँव आज भी तपेड़ा के नाम से विख्यात है। तपेड़ा अर्थात तप करने का स्थान।

गुरू नानकदेव भ्रमण करते हुए यहाँ भी पहुँचे। लेकिन सिद्धों को उनका यहाँ आना अच्छा नही लगा। अतः सिद्धों ने गुरू जी को यहाँ से खदेड़ने के लिए अनेक उपाय किये।

यहाँ आज भी उसी समय का पीपल का एक विशालकाय वृक्ष भी है। जो सिद्धों के जुल्मों की कहानी कह रहा है।
(गुरूद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब विशाल पीपल वृक्ष का दृश्य)
गुरू नानक देव जी अपने दो सेवादारों के साथ इस पीपल के वृक्ष के नीचे आराम कर रहे थे कि सिद्धों ने अपने योग बल से इस महावृक्ष को उड़ाना शुरू कर दिया। इसकी जड़ें जमीन से 15 फीट के लगभग ऊपर उठ चुकी थी।

गुरू नानक जी ने जब यह दृश्य देखा तो उन्होंने अपना हाथ का पंजा इस पेड़ पर रख दिया और पीपल का पेड़ यहीं पर रुक गया।

आज भी जमीन के ऊपर इसकी जड़ें दिखाई देती हैं।

अब सिद्धों ने क्रोध में आकर इस पेड़ में अपने योग बल से आग लगा दी। जिसे गुरू नानक देव ने केशर के छींटे मार कर पुनः हरा-भरा कर दिया।

आज भी इस पीपल के वृक्ष के हर एक पत्ते पर केशर के निशान पाये जाते हैं।

नानकमत्ता के बारे में तो बहुत सी विचित्र जानकारियाँ भरी पड़ी हैं। फिर किसी दिन इससे जुड़ा दूसरा आख्यान प्रकाशित करूँगा।

मंगलवार, जुलाई 07, 2009

‘‘नकल मत करना’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


हम हिन्दुस्तानियों की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम बिना कुछ सोचे विचारे नकल करने लगते हैं। विदेशी संस्कृति की नकल करने में तो हमने सारे कीर्तिमान भंग कर दिये हैं।

सौन्दर्य सदैव परोक्ष में निहित होता है, लेकिन हम लोग प्रत्यक्ष को सौन्दर्य मान कर इसका भौंडा प्रदर्शन करने लगे हैं।

आज हमारी स्थिति रुई से लदे हुए गधे जैसी हो गयी है।

प्रस्तुत है यह मजेदार लघु-कथा-

एक व्यापारी घोड़े पर नमक और गधे पर रुई लाद कर बाजार जा रहा था। मार्ग में एक नदी थी। नदी में घुसते ही घोड़े ने पानी में 2-3 डुबकी लगाईं और चलने लगा। नमक पानी में घुल जाने से उसका वजन कुद हल्का हो गया था।

गधे ने भी यह देख कर बिना कुछ सोचे विचारे पानी में 2-3 डुबकी लगा दी। डुबकी लगाते ही रुई की गाँठें भीग कर इतनी भारी हो गई थीं कि उसका चलना-फिरना भी मुश्किल हो गया था।

किसी ने सच ही कहा है-

‘‘बिना विचारे जो करे, सो पीछे पछताय।

काम बिगाड़े आपनो, जग में होत हँसाय।।’’


शनिवार, जुलाई 04, 2009

‘‘तू से आप और आप से सर’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

लगभग २५-३० वर्ष पुरानी बात है। उस समय उत्तराखण्ड राज्य नही बना था। विशाल उत्तर-प्रदेश था।
मेरा निवास उन दिनों नेपाल सीमा पर बसे छोटे से स्थान बनबसा में हुआ करता था।
बनबसा में उस समय पुलिस-थाना भी नही था।
यानि पढ़े-लिखे व्यक्ति के लिए कोई अच्छा स्थान शाम को बैठने के लिए था ही नही। लेकिन सोसायटी तो हर व्यक्ति को चाहिए ही, इसलिए मैं अक्सर शाम को 4 किमी दूर शारदा नदी के पार बने कस्टम-कार्यालय या इमीग्रेशन चेक-पोस्ट पर बैठने चला जाया करता था।
गर्मियों के दिन थे। समय यही कोई शाम के सात बजे का रहा होगा। एक आफीसर क्लास व्यक्ति नेपाल से घूम कर आ रहा था। उसने कुछ छोटी-मोटी खरीदारी भी नेपाल से की थी।
कस्टम अधिकारी ने उसे रोक लिया। जब उसने अपना परिचय दिया तो कस्टम आफीसर उसे तू-तू करके सम्बोधित करने लगा।
उसे बुरा लगा और उसने- "कहा महोदय आप सभ्यता से तो बात कीजिए।"
इस पर कस्टम अधिकारी ने कहा- "भाई मैं तो मेरठ का रहने वाला हूँ। मेरी बोलचाल की यही भाषा है।"
यह वार्तालाप चल ही रहा था कि - उप-जिलाधिकारी उन सज्जन को लेने के लिए आ गये।
अब तो कस्टम आफीसर का बात करने का लहजा ही बदल चुका था। वो अब तू से आप पर आ गये थे।
कस्टम अधिकारी ने बड़े विनम्र भाव से उन सज्जन से कहा - ‘‘सर! आपने बताया नही कि आप एस0डी0एम0 साहब के रिलेशन में हैं।’’
लेकिन यह सज्जन भी खेले-खाये थे, तपाक से बोले- ‘‘क्यों भाई! अब तुम्हारी मेरठ की भाषा कहाँ चली गयी?’’
इस पर कस्टम अधिकारी की बोलती बन्द हो गयी थी।

गुरुवार, जुलाई 02, 2009

"जमाना बहुत बदल गया है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)





आज से लगभग 30-35 वर्ष पुरानी बात है।

उन दिनों आर्य समाज के एक बड़े विद्वान स्वामी इन्द्रदेव यति का प्रवचन वहाँ चल रहा था। अचानक स्वामी जी के मुँह से यह वाक्य निकल गया-

‘‘टनकपुर मण्डी, हवा चले ठण्डी।’’

अगली लाइन थी- ‘‘नीचे लाला, ऊपर रण्डी।।’’

प्रवचन के दौरान एक लाला जी पुत्र को यह बात बड़ी अशोभनीय लगी। सब लोग तो हँस रहे थे, परन्तु वह स्वामी जी से उलझने लगा।

जब ज्यादा बहसबाजी हो गयी तो स्वामी जी ने कहा कि कि बेटा मैं सत्य बात ही कह रहा हूँ।

उस समय में नीचे लाला जी दूकान करते थे और ऊपर टीनशेड के बने घर में बेश्याएँ रहा करती थी।

ऐसा करो आप अपने दादा जी से यह पूछ कर बताओ कि मैं गलत कह रहा हूँ या सही कह रहा हूँ।

संयोगवश् उसके दादा जी भी स्वामी जी का प्रवचन सुन रहे थे।

जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने भी स्वामी जी की बात का समर्थन किया।

मैंने आज के टनकपुर का जब अच्छी तरह से भ्रमण किया तो मुझे उस समय के टनकपुर का पुराना भवन मिल ही गया। जैसा कि चित्र से स्पष्ट है।

यह लडका कौन रहा होगा? बस इसी को उजागर करने के लिए यह कहानी रची गयी है।

यह लड़का श्याममोहन था। परसों रात किन्ही अज्ञात हमलावरों ने रात में इसकी व इसकी पत्नी की लोहे की राड और सरियों से प्रहार करके जघन्य हत्या कर दी थी।

मैं सन् 1974 से 1985 नेपाल बार्डर पर बसे तक इसके समीपवर्ती ग्राम बनबसा में रहा हूँ। जहाँ तक मुझे याद है मैंने कभी भी रात या दिन में अपने भवन में ताला नही लगाया था।

उस समय में बनबसा और टनकपुर का एक ही जिला-नैनीताल हुआ करता था। पुलिस थाना भी बनबसा में नही था। आज बनबसा-टनकपुर का का जिला चम्पावत हो गया है। बनबसा एक छोटे शहर का रूप ले चुका है। लेकिन उस समय के बनबसा और आज के बनबसा में जमीन-आसमान का अन्तर आ गया है।

आये दिन लूट व हत्या की वारदाते होंने लगी है, या यों कहिए कि यह दोनों शहर दहशतगर्दों की जन्नत बन गये हैं तो कोई अतिश्योक्ति न होगी।

क्योंकि क्राइम करो और नेपाल भाग जाओ। वहाँ न पुलिस का झमेला और न ही पकड़े जाने का भय है।

विदेश है तो भारत की पुलिस वहाँ आपका बाल-बाँका भी नही कर सकती है।

यदि गाँठ में माल हो तो सभी तरह की सुख-सुविधा वहाँ सस्ते में उपलब्ध हैं।

वास्तव में जमाना बहुत बदल गया है।

‘‘आदमी लुटवा रहा है आदमी पिटवा रहा।

आदमी को आदमी ही आज है कटवा रहा।।

आदमी बरसा रहा बारूद की हैं गोलियाँ।

आदमी ही बोलता शैतानियत की बोलियाँ।।

आदमी ही आदमी को आज है खाने लगा।

आदमी कितना घिनौना कार्य अपनाने लगा।

कृपया नापतोल.कॉम से कोई सामन न खरीदें।

मैंने Napptol.com को Order number- 5642977
order date- 23-12-1012 को xelectron resistive SIM calling tablet WS777 का आर्डर किया था। जिसकी डिलीवरी मुझे Delivery date- 11-01-2013 को प्राप्त हुई। इस टैब-पी.सी में मुझे निम्न कमियाँ मिली-
1- Camera is not working.
2- U-Tube is not working.
3- Skype is not working.
4- Google Map is not working.
5- Navigation is not working.
6- in this product found only one camera. Back side camera is not in this product. but product advertisement says this product has 2 cameras.
7- Wi-Fi singals quality is very poor.
8- The battery charger of this product (xelectron resistive SIM calling tablet WS777) has stopped work dated 12-01-2013 3p.m. 9- So this product is useless to me.
10- Napptol.com cheating me.
विनीत जी!!
आपने मेरी शिकायत पर करोई ध्यान नहीं दिया!
नापतोल के विश्वास पर मैंने यह टैबलेट पी.सी. आपके चैनल से खरीदा था!
मैंने इस पर एक आलेख अपने ब्लॉग "धरा के रंग" पर लगाया था!

"नापतोलडॉटकॉम से कोई सामान न खरीदें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जिस पर मुझे कई कमेंट मिले हैं, जिनमें से एक यह भी है-
Sriprakash Dimri – (January 22, 2013 at 5:39 PM)

शास्त्री जी हमने भी धर्मपत्नी जी के चेतावनी देने के बाद भी
नापतोल डाट काम से कार के लिए वैक्यूम क्लीनर ऑनलाइन शापिंग से खरीदा ...
जो की कभी भी नहीं चला ....ईमेल से इनके फोरम में शिकायत करना के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला ..
.हंसी का पात्र बना ..अर्थ हानि के बाद भी आधुनिक नहीं आलसी कहलाया .....
--
मान्यवर,
मैंने आपको चेतावनी दी थी कि यदि आप 15 दिनों के भीतर मेरा प्रोड्कट नहीं बदलेंगे तो मैं
अपने सभी 21 ब्लॉग्स पर आपका पर्दाफास करूँगा।
यह अवधि 26 जनवरी 2013 को समाप्त हो रही है।
अतः 27 जनवरी को मैं अपने सभी ब्लॉगों और अपनी फेसबुक, ट्वीटर, यू-ट्यूब, ऑरकुट पर
आपके घटिया समान बेचने
और भारत की भोली-भाली जनता को ठगने का विज्ञापन प्रकाशित करूँगा।
जिसके जिम्मेदार आप स्वयं होंगे।
इत्तला जानें।